ख़बरें हैं कि बढ़ती महंगाई की स्थिति पर विचार के लिए सोमवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की कीमतों संबंधी समिति बैठक बुलाई गई है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में होनेवाली इस बैठक में कृषि मंत्री शरद पवार, वित्त मंत्री पी चिदंबरम, विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी और वाणिज्य मंत्री कमलनाथ मौजूद रहेंगे।
ग़ौरतलब है कि इस समय भारत में खाद्य वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं।
वित्त सचिव डी सुब्बाराव ने शनिवार को एक सेमिनार के दौरान बढ़ती कीमतों को काबू में लाने के लिए सरकारी क़दमों के बारे में पूछे जाने पर इस बैठक के बारे में जानकारी दी थी।
उनका कहना था कि मुद्रास्फ़ीति की दर काफ़ी चिंताजनक है, इसके लिए काफ़ी हद तक अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोत्तरी ज़िम्मेदार है।
उल्लेखनीय है कि इस समय मुद्रास्फ़ीति की दर 13 माह के सर्वोच्च स्तर 6।68 प्रतिशत पर है।
कुछ महीने पहले तक यह दर चार फ़ीसदी के आसपास थी लेकिन 15 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में यह 0।76 फ़ीसदी की बढ़त के साथ 6।68 तक पहुँच गई।
वामपंथियों की चेतावनी
दूसरी ओर महंगाई को लेकर न केवल विपक्षी भारतीय जनता पार्टी बल्कि सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने भी चेतावनी दी है।
पंद्रह अप्रैल के बाद वामपंथी अन्य दलों के साथ बातचीत कर कीमतों में वृद्धि के ख़िलाफ़ देशव्यापी आंदोलन छेड़ेगे
सीताराम येचुरी, सीपीएम नेता
वामपंथी दलों ने बढ़ती महंगाई के लिए कांग्रेस नेतृत्ववाली यूपीए सरकार की आलोचना की है।
सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने कोयंबटूर में पार्टी कांग्रेस के दौरान पत्रकारों से बातचीत में कहा कि पार्टी ने महंगाई पर नियंत्रण के लिए 15 अप्रैल की समयसीमा तय की है।
उनका कहना था,'' पंद्रह अप्रैल के बाद वामपंथी अन्य दलों के साथ बातचीत कर कीमतों में वृद्धि के ख़िलाफ़ देशव्यापी आंदोलन छेड़ेगे।''
उन्होंने कहा कि सरकार को इस संबंध में तत्काल क़दम उठाने चाहिए।
येचुरी का कहना था कि सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं और आम आदमी के लिए यह काफ़ी मुश्किल स्थिति है।
Monday, March 31, 2008
Friday, March 28, 2008
इराक़ में हिंसा जारी, बग़दाद में कर्फ़्यू
पिछले कुछ दिनों से जारी हिंसा के दौर को देखते हुए इराक़ सरकार ने राजधानी बग़दाद में तीन दिन के लिए कर्फ़्यू लगा दिया है।
इस सप्ताह की शुरुआत से ही इराक़ के दक्षिणी शहर बसरा में शिया कट्टरपंथियों और इराक़ी सेना के बीच भीषण संघर्ष जारी है जिसमें 130 से भी ज़्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं।
बसरा से शुरू हुई हिंसा बाद में देश के अन्य शिया आबादी वाले हिस्सों में भी फैलने लगी। राजधानी बग़दाद के शिया आबादी वाले क्षेत्र में भी हिंसक झड़पें हुई हैं।
स्थिति को देखते हुए अब इराक़ सरकार ने राजधानी में तीन दिन के लिए कर्फ़्यू लगा दिया है।
शिया कट्टरपंथियों को चेतावनी
अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इराक़ में शिया कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अभियान को अपना समर्थन देते हुए कट्टरपंथियों से निपटने के प्रयासों की सराहना की है।
उन्होंने इराक़ी प्रधानमंत्री के शिया कट्टरपंथियों से कठोरता से निपटने के क़दम की भी सराहना की। इराक़ी सेना के अभियान को अमरीकी सैनिकों की ओर से भी मदद मिल रही है।
हिंसा के दौरान दो अमरीकी लोगों के मारे जाने के बाद अमरीकी सरकार ने बग़दाद स्थित अपने दूतावास के कर्मचारियों को सतर्क कर दिया है और कहा है कि वे ग्रीन ज़ोन इलाके से बाहर न निकलें।
शिया लड़ाकों को चेतावनी
इससे पहले बुधवार को इराक़ी प्रधानमंत्री नूर अल मलिकी ने चेतावनी दी थी कि अगर बसरा में संघर्ष कर रहे शिया कट्टरपंथी 72 घंटे में हथियार नहीं छोड़ते हैं तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
शिया लड़ाके
पिछले दो दिनों के दौरान 70 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं
उधर प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद शिया कट्टरपंथियों के नेता ने कुछ नरमी दिखाते हुए समझौते का प्रस्ताव रखा है।
इराक़ के कट्टरपंथी शिया संगठन के सरबरा मुक्तदा अल सद्र ने कहा है कि अगर इराक़ी प्रधानमंत्री बसरा छोड़ दें तो दोनों पक्षों के बीच बातचीत की संभावना बन सकती है।
सद्र ने गुरुवार को जारी एक बयान में कहा है कि इस पूरे मसले का राजनीतिक हल निकालने का प्रयास किया जाना चाहिए।
शिया बाहुल्य क्षेत्र बसरा सुरक्षा की दृष्टि से पिछले कुछ बरसों से ख़ासा संवेदनशील इलाका रहा है।
इराक़ पर 2003 में अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन के हमले के बाद से बसरा में ब्रितानी सैनिक तैनात किए गए थे और उस इलाक़े की ज़िम्मेदारी उन्हीं पर थी। हालांकि पिछले वर्ष के अंत में ब्रितानी सरकार ने बसरा का नियंत्रण इराक़ी सुरक्षाबलों को सौंप दिया था।
तेल के बड़े भंडार वाले स्थान के तौर पर जाने जानेवाला बसरा वर्चस्व और प्रभाव की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
इस सप्ताह की शुरुआत से ही इराक़ के दक्षिणी शहर बसरा में शिया कट्टरपंथियों और इराक़ी सेना के बीच भीषण संघर्ष जारी है जिसमें 130 से भी ज़्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं।
बसरा से शुरू हुई हिंसा बाद में देश के अन्य शिया आबादी वाले हिस्सों में भी फैलने लगी। राजधानी बग़दाद के शिया आबादी वाले क्षेत्र में भी हिंसक झड़पें हुई हैं।
स्थिति को देखते हुए अब इराक़ सरकार ने राजधानी में तीन दिन के लिए कर्फ़्यू लगा दिया है।
शिया कट्टरपंथियों को चेतावनी
अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इराक़ में शिया कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अभियान को अपना समर्थन देते हुए कट्टरपंथियों से निपटने के प्रयासों की सराहना की है।
उन्होंने इराक़ी प्रधानमंत्री के शिया कट्टरपंथियों से कठोरता से निपटने के क़दम की भी सराहना की। इराक़ी सेना के अभियान को अमरीकी सैनिकों की ओर से भी मदद मिल रही है।
हिंसा के दौरान दो अमरीकी लोगों के मारे जाने के बाद अमरीकी सरकार ने बग़दाद स्थित अपने दूतावास के कर्मचारियों को सतर्क कर दिया है और कहा है कि वे ग्रीन ज़ोन इलाके से बाहर न निकलें।
शिया लड़ाकों को चेतावनी
इससे पहले बुधवार को इराक़ी प्रधानमंत्री नूर अल मलिकी ने चेतावनी दी थी कि अगर बसरा में संघर्ष कर रहे शिया कट्टरपंथी 72 घंटे में हथियार नहीं छोड़ते हैं तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
शिया लड़ाके
पिछले दो दिनों के दौरान 70 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं
उधर प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद शिया कट्टरपंथियों के नेता ने कुछ नरमी दिखाते हुए समझौते का प्रस्ताव रखा है।
इराक़ के कट्टरपंथी शिया संगठन के सरबरा मुक्तदा अल सद्र ने कहा है कि अगर इराक़ी प्रधानमंत्री बसरा छोड़ दें तो दोनों पक्षों के बीच बातचीत की संभावना बन सकती है।
सद्र ने गुरुवार को जारी एक बयान में कहा है कि इस पूरे मसले का राजनीतिक हल निकालने का प्रयास किया जाना चाहिए।
शिया बाहुल्य क्षेत्र बसरा सुरक्षा की दृष्टि से पिछले कुछ बरसों से ख़ासा संवेदनशील इलाका रहा है।
इराक़ पर 2003 में अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन के हमले के बाद से बसरा में ब्रितानी सैनिक तैनात किए गए थे और उस इलाक़े की ज़िम्मेदारी उन्हीं पर थी। हालांकि पिछले वर्ष के अंत में ब्रितानी सरकार ने बसरा का नियंत्रण इराक़ी सुरक्षाबलों को सौंप दिया था।
तेल के बड़े भंडार वाले स्थान के तौर पर जाने जानेवाला बसरा वर्चस्व और प्रभाव की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
Thursday, March 27, 2008
'चीन निर्वासित तिब्बती सरकार से बातचीत करे'
अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने चीन से अनुरोध किया है कि वो तिब्बत मसले पर निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रतिनिधि, दलाई लामा से बातचीत का सिलसिला शुरू करे।
अमरीकी राष्ट्रपति ने बुधवार को चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ से इस संबंध में टेलीफ़ोन के ज़रिए बातचीत की।
बातचीत में अमरीकी राष्ट्रपति ने चीनी राष्ट्रपति से यह भी अनुरोध किया कि तिब्बत में पत्रकारों और राजनायिकों को आने-जाने से न रोका जाए।
इससे पहले बुधवार को ही चीनी प्रशासन की देखरेख और नियंत्रण में विदेशी पत्रकारों का एक प्रतिनिधिमंडल तिब्बत पहुँचा है।
पिछले दिनों तिब्बत में शुरू हुए चीन विरोधी प्रदर्शनों और उसके बाद हुई हिंसा के बाद विदेशी पर्यटकों और ख़ासतौर पर पत्रकारों के आने पर लोग गए थे।
प्रेस के एक पत्रकार ने बताया है कि तिब्बत की राजधानी ल्हासा की स्थिति छावनी जैसी बनी हुई है और चप्पे-चप्पे पर पुलिस की तैनाती है।
एपी के पत्रकार ने बताया कि सरकारी भवनों की सुरक्षा के लिए अभी भी बड़ी तादाद में सुरक्षाकर्मी तैनात कर रखे गए हैं।
चीन का विरोध
इस बीच दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में तिब्बत मूल के लोगों का चीन विरोध जारी है।
तिब्बत
ल्हासा की स्थिति अभी भी छावनी जैसी बनी हुई है।
बुधवार को भारत प्रशासित कश्मीर की राजधानी में भी कुछ तिब्बती मूल के लोगों ने एक शांतिपूर्ण मार्च निकालकर अपना विरोध दर्ज किया था।
हालांकि इस प्रदर्शन में तिब्बत मूल के मुस्लिम लोगों ने हिस्सा नहीं लिया।
ग़ौरतलब है कि भारत में शरण लेकर रह रही तिब्बत की निर्वासित सरकार समय समय पर चीन से तिब्बत को स्वायत्त करने और अपने प्रभाव से मुक्त करने की मांग करती रही है।
इस वर्ष चीन में ओलंपिक खेलों का आयोजन होना है और ऐसे मौके पर स्वायत्त तिब्बत की मांग करने वाले लोग इस मुद्दे को दुनिया के सामने लाने का मौका नहीं खोना चाहते।
तिब्बत की राजधानी ल्हासा में पिछले दिनों इन्हीं मुद्दों पर कुछ उग्र प्रदर्शन हुए जिसके बाद प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग भी हुआ।
निर्वासित तिब्बती सरकार के मुताबिक यहाँ प्रदर्शनों के दौरान भड़की हिंसा में कम से कम 80 लोगों की मौत हो गई थी।
अमरीकी राष्ट्रपति ने बुधवार को चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ से इस संबंध में टेलीफ़ोन के ज़रिए बातचीत की।
बातचीत में अमरीकी राष्ट्रपति ने चीनी राष्ट्रपति से यह भी अनुरोध किया कि तिब्बत में पत्रकारों और राजनायिकों को आने-जाने से न रोका जाए।
इससे पहले बुधवार को ही चीनी प्रशासन की देखरेख और नियंत्रण में विदेशी पत्रकारों का एक प्रतिनिधिमंडल तिब्बत पहुँचा है।
पिछले दिनों तिब्बत में शुरू हुए चीन विरोधी प्रदर्शनों और उसके बाद हुई हिंसा के बाद विदेशी पर्यटकों और ख़ासतौर पर पत्रकारों के आने पर लोग गए थे।
प्रेस के एक पत्रकार ने बताया है कि तिब्बत की राजधानी ल्हासा की स्थिति छावनी जैसी बनी हुई है और चप्पे-चप्पे पर पुलिस की तैनाती है।
एपी के पत्रकार ने बताया कि सरकारी भवनों की सुरक्षा के लिए अभी भी बड़ी तादाद में सुरक्षाकर्मी तैनात कर रखे गए हैं।
चीन का विरोध
इस बीच दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में तिब्बत मूल के लोगों का चीन विरोध जारी है।
तिब्बत
ल्हासा की स्थिति अभी भी छावनी जैसी बनी हुई है।
बुधवार को भारत प्रशासित कश्मीर की राजधानी में भी कुछ तिब्बती मूल के लोगों ने एक शांतिपूर्ण मार्च निकालकर अपना विरोध दर्ज किया था।
हालांकि इस प्रदर्शन में तिब्बत मूल के मुस्लिम लोगों ने हिस्सा नहीं लिया।
ग़ौरतलब है कि भारत में शरण लेकर रह रही तिब्बत की निर्वासित सरकार समय समय पर चीन से तिब्बत को स्वायत्त करने और अपने प्रभाव से मुक्त करने की मांग करती रही है।
इस वर्ष चीन में ओलंपिक खेलों का आयोजन होना है और ऐसे मौके पर स्वायत्त तिब्बत की मांग करने वाले लोग इस मुद्दे को दुनिया के सामने लाने का मौका नहीं खोना चाहते।
तिब्बत की राजधानी ल्हासा में पिछले दिनों इन्हीं मुद्दों पर कुछ उग्र प्रदर्शन हुए जिसके बाद प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग भी हुआ।
निर्वासित तिब्बती सरकार के मुताबिक यहाँ प्रदर्शनों के दौरान भड़की हिंसा में कम से कम 80 लोगों की मौत हो गई थी।
Wednesday, March 26, 2008
टाटा-जगुआर-लैंड रोवर सौदे की घोषणा संभव
भारतीय कंपनी टाटा मोटर्स बुधवार को अमरीकी कंपनी फ़ोर्ड के दो ब्रितानी ब्रांड जगुआर और लैंड रोवर की ख़रीद की घोषणा कर सकती है।
इस संदर्भ में बातचीत और ख़रीद के दाम पर बातचीत का काम पूरा हो चुका है। बताया जा रहा है कि टाटा इन दोनों कंपनियों के लिए दो अरब अमरीकी डॉलर अदा कर रही है।
हालांकि सौदे की रक़म को लेकर भी कोई स्पष्ट जानकारी आधिकारिक तौर पर नहीं दी गई है और बुधवार को जब सौदे की घोषणा होगी तो लोगों की नज़र सौदे के लिए तय रक़म पर होगी।
व्यापार जगत के लोगों की नज़र इस बात पर भी होगी कि किन शर्तों पर टाटा इन ब्रांडों को ख़रीद रहा है।
जगुआर और लैंड रोवर मूल रूप से ब्रितानी कारें हैं जिसे अमरीकी ऑटोमोबाइल कंपनी फ़ोर्ड ने ख़रीद लिया था।
फ़ोर्ड ने अपनी इन दोनों कंपनियों को बेचने की मंशा जाहिर की थी जिसके बाद टाटा के साथ पिछले वर्ष जून से ही इस सौदे के संदर्भ में बातचीत चल रही थी।
टाटा का प्रभाव
टाटा मोटर्स का भारतीय बाज़ार में व्यापक प्रभाव है। टाटा का भारत के ट्रक बाज़ार के आधे से भी बड़े हिस्से पर कब्ज़ा है और साथ ही कार बाज़ार में भी 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी है।
रतन टाटा
टाटा की भारतीय कार बाज़ार में 20 फ़ीसदी की हिस्सेदारी है
जगुआर और लैंड रोवर ब्रिटेन में लोकप्रिय और भरोसेमंद कारें मानी जाती हैं।
टाटा ने सबसे पहले अगस्त 2007 में कहा था कि वह इन कंपनियों को ख़रीदने में दिलचस्पी रखती है। हालाँकि इस सौदे में एक और निजी कंपनी- वन इक्विटी ने भी दिलचस्पी दिखाई थी।
एक अन्य भारतीय कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा ने भी ख़ुद को जगुआर और लैंड रोवर कंपनियों का एक संभावित ख़रीदार बताया था।
ग़ौरतलब है कि टाटा ने इसी वर्ष की शुरुआत में एक लाख की कार भारतीय बाज़ार में उतारने की घोषणा करके दुनियाभर के कार बाज़ार में खलबली मचा दी थी।
अब जगुआर और लैंड रोवर ख़रीदने के साथ ही टाटा की कार बाज़ार पर पकड़ और भी मज़बूत हो जाएगी।
इस संदर्भ में बातचीत और ख़रीद के दाम पर बातचीत का काम पूरा हो चुका है। बताया जा रहा है कि टाटा इन दोनों कंपनियों के लिए दो अरब अमरीकी डॉलर अदा कर रही है।
हालांकि सौदे की रक़म को लेकर भी कोई स्पष्ट जानकारी आधिकारिक तौर पर नहीं दी गई है और बुधवार को जब सौदे की घोषणा होगी तो लोगों की नज़र सौदे के लिए तय रक़म पर होगी।
व्यापार जगत के लोगों की नज़र इस बात पर भी होगी कि किन शर्तों पर टाटा इन ब्रांडों को ख़रीद रहा है।
जगुआर और लैंड रोवर मूल रूप से ब्रितानी कारें हैं जिसे अमरीकी ऑटोमोबाइल कंपनी फ़ोर्ड ने ख़रीद लिया था।
फ़ोर्ड ने अपनी इन दोनों कंपनियों को बेचने की मंशा जाहिर की थी जिसके बाद टाटा के साथ पिछले वर्ष जून से ही इस सौदे के संदर्भ में बातचीत चल रही थी।
टाटा का प्रभाव
टाटा मोटर्स का भारतीय बाज़ार में व्यापक प्रभाव है। टाटा का भारत के ट्रक बाज़ार के आधे से भी बड़े हिस्से पर कब्ज़ा है और साथ ही कार बाज़ार में भी 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी है।
रतन टाटा
टाटा की भारतीय कार बाज़ार में 20 फ़ीसदी की हिस्सेदारी है
जगुआर और लैंड रोवर ब्रिटेन में लोकप्रिय और भरोसेमंद कारें मानी जाती हैं।
टाटा ने सबसे पहले अगस्त 2007 में कहा था कि वह इन कंपनियों को ख़रीदने में दिलचस्पी रखती है। हालाँकि इस सौदे में एक और निजी कंपनी- वन इक्विटी ने भी दिलचस्पी दिखाई थी।
एक अन्य भारतीय कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा ने भी ख़ुद को जगुआर और लैंड रोवर कंपनियों का एक संभावित ख़रीदार बताया था।
ग़ौरतलब है कि टाटा ने इसी वर्ष की शुरुआत में एक लाख की कार भारतीय बाज़ार में उतारने की घोषणा करके दुनियाभर के कार बाज़ार में खलबली मचा दी थी।
अब जगुआर और लैंड रोवर ख़रीदने के साथ ही टाटा की कार बाज़ार पर पकड़ और भी मज़बूत हो जाएगी।
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Tuesday, March 25, 2008
राष्ट्रपति बुश से परमाणु समझौते पर चर्चा
विदेश मंत्री के रूप में पहली बार अमरीका गए प्रणव मुखर्जी ने सोमवार को राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से मुलाक़ात की।
समाचार एजेंसियों का कहना है कि मुलाक़ात के दौरान परमाणु समझौते का मुद्दा उठा और द्विपक्षीय संबंधों पर भी चर्चा हुई।
लेकिन विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी इस मुलाक़ात का विस्तार से विवरण मंगलवार को एक संवाददाता सम्मेलन में देंगे।
राष्ट्रपति बुश और प्रणब मुखर्जी की मुलाक़ात 35 मिनट तक चली।
बातचीत के दौरान विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी के साथ अमरीका में भारतीय दूत रोनेन सेन और विदेश सचिव शिवशंकर मेनन भी मौजूद थे।
जबकि राष्ट्रपति बुश के साथ विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्टीफ़ेन हैडली भी थे।
राष्ट्रपति बुश से मुलाक़ात से पहले प्रणव मुखर्जी ने विदेश मंत्री कोडोंलीज़ा राइस से भी मुलाक़ात की थी।
'राजनीतिक समस्या'
कोंडोलीज़ा राइस के साथ मुलाक़ात के बाद विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि दोनों देशों के बीच परमाणु समझौते को लेकर कुछ 'राजनीतिक समस्या' है।
प्रणव मुखर्जी और कोंडोलीज़ा राइस
प्रणव मुखर्जी ने कहा कि समझौते को लेकर कुछ समस्या है
दोनों नेताओं की मुलाक़ात 30 मिनट तक चली। मुलाक़ात के बाद प्रणव मुखर्जी ने पत्रकारों को बताया कि दोनों देश परमाणु समझौते पर काम करना जारी रखेंगे।
उन्होंने कहा, "हम इस ऐतिहासिक परमाणु समझौते को लागू करना चाहते हैं। लेकिन इसे लेकर कुछ राजनीतिक समस्या है। इस समय हम इस समस्या को सुलझाने की कोशिश में लगे हैं।"
विदेश मंत्री के रूप में पहली बार अमरीका गए प्रणव मुखर्जी ने कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर कई राजनीतिक पार्टियों के साथ विचार-विमर्श कर रही है।
कोशिश
दूसरी ओर परमाणु समझौते को आगे ले जाने की इच्छा व्यक्त करते हुए अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने कहा, "यह ऐतिहासिक समझौता है, जो दोनों देशों के लिए अच्छा है। हम इस समझौते पर काम करना जारी रखेंगे।"
समझौते में समस्या
हम इस ऐतिहासिक परमाणु समझौते को लागू करना चाहते हैं. लेकिन इसे लेकर कुछ राजनीतिक समस्या है. इस समय हम इस समस्या को सुलझाने की कोशिश में लगे हैं
प्रणव मुखर्जी
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ परमाणु ठिकाने की सुरक्षा के मुद्दे पर बातचीत के बारे में प्रणब मुखर्जी ने कहा कि विचार-विमर्श ख़त्म हो चुका है और अब आईएईए के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर इसे मंज़ूरी देंगे।
परमाणु सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) के साथ परमाणु ईंधन के व्यापार के लिए आईएईए के साथ समझौता ज़रूरी होता है।
भारत में सरकार को बाहर से समर्थन दे रही वामपंथी पार्टियाँ मौजूदा स्वरूप में परमाणु समझौते का विरोध कर रही हैं। इन दलों ने धमकी दी है कि अगर सरकार ने समझौते को लागू करने की दिशा में पहल की, तो वे अपना समर्थन वापस ले लेंगे।
समाचार एजेंसियों का कहना है कि मुलाक़ात के दौरान परमाणु समझौते का मुद्दा उठा और द्विपक्षीय संबंधों पर भी चर्चा हुई।
लेकिन विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी इस मुलाक़ात का विस्तार से विवरण मंगलवार को एक संवाददाता सम्मेलन में देंगे।
राष्ट्रपति बुश और प्रणब मुखर्जी की मुलाक़ात 35 मिनट तक चली।
बातचीत के दौरान विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी के साथ अमरीका में भारतीय दूत रोनेन सेन और विदेश सचिव शिवशंकर मेनन भी मौजूद थे।
जबकि राष्ट्रपति बुश के साथ विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्टीफ़ेन हैडली भी थे।
राष्ट्रपति बुश से मुलाक़ात से पहले प्रणव मुखर्जी ने विदेश मंत्री कोडोंलीज़ा राइस से भी मुलाक़ात की थी।
'राजनीतिक समस्या'
कोंडोलीज़ा राइस के साथ मुलाक़ात के बाद विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि दोनों देशों के बीच परमाणु समझौते को लेकर कुछ 'राजनीतिक समस्या' है।
प्रणव मुखर्जी और कोंडोलीज़ा राइस
प्रणव मुखर्जी ने कहा कि समझौते को लेकर कुछ समस्या है
दोनों नेताओं की मुलाक़ात 30 मिनट तक चली। मुलाक़ात के बाद प्रणव मुखर्जी ने पत्रकारों को बताया कि दोनों देश परमाणु समझौते पर काम करना जारी रखेंगे।
उन्होंने कहा, "हम इस ऐतिहासिक परमाणु समझौते को लागू करना चाहते हैं। लेकिन इसे लेकर कुछ राजनीतिक समस्या है। इस समय हम इस समस्या को सुलझाने की कोशिश में लगे हैं।"
विदेश मंत्री के रूप में पहली बार अमरीका गए प्रणव मुखर्जी ने कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर कई राजनीतिक पार्टियों के साथ विचार-विमर्श कर रही है।
कोशिश
दूसरी ओर परमाणु समझौते को आगे ले जाने की इच्छा व्यक्त करते हुए अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने कहा, "यह ऐतिहासिक समझौता है, जो दोनों देशों के लिए अच्छा है। हम इस समझौते पर काम करना जारी रखेंगे।"
समझौते में समस्या
हम इस ऐतिहासिक परमाणु समझौते को लागू करना चाहते हैं. लेकिन इसे लेकर कुछ राजनीतिक समस्या है. इस समय हम इस समस्या को सुलझाने की कोशिश में लगे हैं
प्रणव मुखर्जी
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ परमाणु ठिकाने की सुरक्षा के मुद्दे पर बातचीत के बारे में प्रणब मुखर्जी ने कहा कि विचार-विमर्श ख़त्म हो चुका है और अब आईएईए के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर इसे मंज़ूरी देंगे।
परमाणु सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) के साथ परमाणु ईंधन के व्यापार के लिए आईएईए के साथ समझौता ज़रूरी होता है।
भारत में सरकार को बाहर से समर्थन दे रही वामपंथी पार्टियाँ मौजूदा स्वरूप में परमाणु समझौते का विरोध कर रही हैं। इन दलों ने धमकी दी है कि अगर सरकार ने समझौते को लागू करने की दिशा में पहल की, तो वे अपना समर्थन वापस ले लेंगे।
Monday, March 24, 2008
राजतंत्र की पहल पर लोकतंत्र के लिए मतदान
सौ साल से ज़्यादा की राजशाही के बाद भूटान में पहली बार सोमवार को लोकतांत्रिक चुनाव हो रहे हैं। इस ऐतिहासिक चुनाव में भूटान की जनता 47 संसदीय सीटों के लिए अपनी प्रतिनिधियों का चुनाव करेगी।
भारत और चीन के बीच स्थित इस छोटे देश के शाही परिवार ने ही लोकतांत्रिक चुनाव की पहल की थी जिसका मानना है कि अब देश की जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनने के लिए तैयार हो गई है।
हालाँकि बड़ी संख्या में लोग यह भी मानते हैं कि वे राजशाही से ख़ुश हैं। भूटान के पहले संसदीय चुनाव में सिर्फ़ दो पार्टियाँ ही अपना क़िस्मत आज़मा रही हैं।
दोनों पार्टियों पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और भूटान हॉर्मनी पार्टी ने जनता से वादा किया है कि चुनाव जीतने पर वे देश की आर्थिक प्रगति पर ध्यान देंगी और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाएँगी।
दोनों पार्टियों का नेतृत्व पूर्व मंत्रियों के हाथ में है। पीपुल्ल डेमोक्रेटिक पार्टी की कमान संभाल रहे हैं संगय नगेडप, जो पूर्व राजा की पत्नी के भाई हैं। जबकि भूटान हॉर्मनी पार्टी का नेतृत्व जिग्मी थिनली कर रहे हैं और शाही परिवार से उनका कोई संबंध नहीं है।
पार्टियाँ
लेकिन उन्होंने अपनी पार्टी को भूटान की आम जनता से जोड़ने की कोशिश की है। भूटान में संसद के ऊपरी सदन के लिए दिसंबर में चुनाव हुए थे।
मतपेटियाँ दूर-दराज़ के इलाक़ों तक पहुँचा दी गई हैं
भूटान में उस समय से लोकतंत्र की तैयारी चल रही है जब पूर्व शासक जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने चुनी हुई सरकार को सत्ता सौंपने का फ़ैसला किया था।
इस समय भूटान के राजा हैं जिग्मे खेसर नमग्याल वांगचुक, जो जिग्मे सिंग्ये वांगचुक के बेटे हैं। जो लोकतांत्रिक सरकार आने के बाद भी देश के प्रमुख बने रहेंगे और उनके पास कुछ अधिकार भी रहेंगे।
भूटान के कई लोग राजशाही से ख़ुश हैं और उन्हें काफ़ी दुश है कि उनके राजा गद्दी छोड़ रहे हैं।
42 वर्षीय व्यापारी किनले पेंजोर ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया- हर कोई इससे काफ़ी दुख है कि राजा हट रहे हैं। लेकिन मैं मानता हूँ कि लोकतंत्र भी अच्छा रहेगा। अब हम सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधियों को ही चुनेंगे।
राजशाही की लोकप्रियता के बावजूद भूटान में कई तरह की समस्याएँ हैं। हाल के वर्षों में ग़रीबी बढ़ी है और बेरोज़गारी भी।
भूटान की राजधानी थिम्पू की सड़कें ख़ाली-ख़ाली हैं और दूकानें बंद हैं क्योंकि हज़ारों लोग अपने-अपने संसदीय क्षेत्र में वोट डालने चले गए हैं।
भारत और चीन के बीच स्थित इस छोटे देश के शाही परिवार ने ही लोकतांत्रिक चुनाव की पहल की थी जिसका मानना है कि अब देश की जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनने के लिए तैयार हो गई है।
हालाँकि बड़ी संख्या में लोग यह भी मानते हैं कि वे राजशाही से ख़ुश हैं। भूटान के पहले संसदीय चुनाव में सिर्फ़ दो पार्टियाँ ही अपना क़िस्मत आज़मा रही हैं।
दोनों पार्टियों पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और भूटान हॉर्मनी पार्टी ने जनता से वादा किया है कि चुनाव जीतने पर वे देश की आर्थिक प्रगति पर ध्यान देंगी और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाएँगी।
दोनों पार्टियों का नेतृत्व पूर्व मंत्रियों के हाथ में है। पीपुल्ल डेमोक्रेटिक पार्टी की कमान संभाल रहे हैं संगय नगेडप, जो पूर्व राजा की पत्नी के भाई हैं। जबकि भूटान हॉर्मनी पार्टी का नेतृत्व जिग्मी थिनली कर रहे हैं और शाही परिवार से उनका कोई संबंध नहीं है।
पार्टियाँ
लेकिन उन्होंने अपनी पार्टी को भूटान की आम जनता से जोड़ने की कोशिश की है। भूटान में संसद के ऊपरी सदन के लिए दिसंबर में चुनाव हुए थे।
मतपेटियाँ दूर-दराज़ के इलाक़ों तक पहुँचा दी गई हैं
भूटान में उस समय से लोकतंत्र की तैयारी चल रही है जब पूर्व शासक जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने चुनी हुई सरकार को सत्ता सौंपने का फ़ैसला किया था।
इस समय भूटान के राजा हैं जिग्मे खेसर नमग्याल वांगचुक, जो जिग्मे सिंग्ये वांगचुक के बेटे हैं। जो लोकतांत्रिक सरकार आने के बाद भी देश के प्रमुख बने रहेंगे और उनके पास कुछ अधिकार भी रहेंगे।
भूटान के कई लोग राजशाही से ख़ुश हैं और उन्हें काफ़ी दुश है कि उनके राजा गद्दी छोड़ रहे हैं।
42 वर्षीय व्यापारी किनले पेंजोर ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया- हर कोई इससे काफ़ी दुख है कि राजा हट रहे हैं। लेकिन मैं मानता हूँ कि लोकतंत्र भी अच्छा रहेगा। अब हम सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधियों को ही चुनेंगे।
राजशाही की लोकप्रियता के बावजूद भूटान में कई तरह की समस्याएँ हैं। हाल के वर्षों में ग़रीबी बढ़ी है और बेरोज़गारी भी।
भूटान की राजधानी थिम्पू की सड़कें ख़ाली-ख़ाली हैं और दूकानें बंद हैं क्योंकि हज़ारों लोग अपने-अपने संसदीय क्षेत्र में वोट डालने चले गए हैं।
Friday, March 21, 2008
हिंसा प्रभावित परिवारों को आर्थिक मदद
यूपीए सरकार ने उस योजना को मंज़ूरी दे दी है जिसके तहत देश भर में हिंसा के शिकार लोगों के परिवारजनों को तीन लाख तक की आर्थिक सहायता दी जाएगी।
इसके दायरे में 'आतंकवादी हिंसा', नक्सली हिंसा और सांप्रदायिक हिंसा मारे गए लोगों के परिवार आएँगे।
यह लंबे समय से विचाराधीन एक मांग थी जिस पर केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने गुरुवार को अपनी मुहर लगाई है।
इस फ़ैसले की जानकारी देते हुए केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने कहा कि नेशनल फ़ाउंडेशन ऑफ़ कम्युनल हार्मोनी (एनएफ़सीएच) इस परियोजना को चलाएगी।
उन्होंने बताया कि इस योजना की अधिसूचना जारी होने के साथ ही यह लागू हो जाएगी।
सूचूना प्रसारण मंत्री दासमुंशी ने कहा कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लिए जो नियम क़ायदे लागू हैं वो सामान्य नागरिकों पर लागू नहीं होंगे।
उन्होंने बताया कि पीड़ित लोगों के खाते में तीन लाख तक की रकम हादसे के तत्काल जमा कर दी जाएगी। इस रकम का ब्याज त्रैमासिक किस्तों में पीडितों को मिलेगा और तीन साल बाद परिवारजन यह रकम बैंक से निकाल सकेगें।
दासमुंशी ने कहा की इस सन्दर्भ में विस्तृत योजना बन रही है।
उन्होंने कहा कि इस योजना के लागू होने के बाद स्थाई रूप से विकलांग लोगों को भी लाभ मिलेगा।
एक दूसरे फ़ैसले में गाँव में रह रहे लोगों को इंदिरा आवास योजना के तहत मिलने वाली सहायता 25 हज़ार से बढ़ा कर 35 हज़ार करने का फैसला लिया गया है।
पहाड़ी इलाकों के लिए यह सहायता ग्यारह हज़ार से अड़तीस हज़ार पांच सौ तक बढ़ा दी गई है।
इसके दायरे में 'आतंकवादी हिंसा', नक्सली हिंसा और सांप्रदायिक हिंसा मारे गए लोगों के परिवार आएँगे।
यह लंबे समय से विचाराधीन एक मांग थी जिस पर केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने गुरुवार को अपनी मुहर लगाई है।
इस फ़ैसले की जानकारी देते हुए केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने कहा कि नेशनल फ़ाउंडेशन ऑफ़ कम्युनल हार्मोनी (एनएफ़सीएच) इस परियोजना को चलाएगी।
उन्होंने बताया कि इस योजना की अधिसूचना जारी होने के साथ ही यह लागू हो जाएगी।
सूचूना प्रसारण मंत्री दासमुंशी ने कहा कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लिए जो नियम क़ायदे लागू हैं वो सामान्य नागरिकों पर लागू नहीं होंगे।
उन्होंने बताया कि पीड़ित लोगों के खाते में तीन लाख तक की रकम हादसे के तत्काल जमा कर दी जाएगी। इस रकम का ब्याज त्रैमासिक किस्तों में पीडितों को मिलेगा और तीन साल बाद परिवारजन यह रकम बैंक से निकाल सकेगें।
दासमुंशी ने कहा की इस सन्दर्भ में विस्तृत योजना बन रही है।
उन्होंने कहा कि इस योजना के लागू होने के बाद स्थाई रूप से विकलांग लोगों को भी लाभ मिलेगा।
एक दूसरे फ़ैसले में गाँव में रह रहे लोगों को इंदिरा आवास योजना के तहत मिलने वाली सहायता 25 हज़ार से बढ़ा कर 35 हज़ार करने का फैसला लिया गया है।
पहाड़ी इलाकों के लिए यह सहायता ग्यारह हज़ार से अड़तीस हज़ार पांच सौ तक बढ़ा दी गई है।
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Thursday, March 20, 2008
'ओसामा के संदेश' में गंभीर प्रतिक्रिया की चेतावनी
अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के संदेश वाले एक ऑडियो टेप में यूरोपीय संघ के नेताओं को पैगंबर मोहम्मद के कार्टून दोबारा छापे जाने के सिलसिले में गंभीर प्रतिक्रिया की चेतावनी दी गई है।
बताया गया है कि ये ऑडियो टेप में जो संदेश है वह ओसामा की आवाज़ में है लेकिन इसकी फ़िलहाल पुष्टि नहीं हो पाई है।
सितंबर 2005 में डेनमार्क के अख़बार ने 12 कार्टूनों की सिरीज़ प्रकाशित की थी जिसमें पैगंबर मोहम्मद को इस्लामी चरमपंथी के रूप में प्रदर्शित किया गया था। वर्ष 2006 में इस पर मुस्लिम जगत में गुस्सा भड़क उठा।
हालाँकि अख़ाबार ने इन कार्टूनों के लिए माफ़ी माँग ली लेकिन अरब देशों, दक्षिण एशियाई देशों और अफ़्रीकी देशों में भी मुसलमानों में इस विषय पर ख़ासा रोष सामने आया और सीरिया में डेनमार्क और नॉर्वे के दूतावासों में आग लगा दी गई थी।
दोबारा छपे कार्टून
ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और ख़तरनाक भी...यदि आपकी अभिव्यक्ति की आज़ादी की कोई हद नहीं है तो अपने दिलों को हमारी कार्रवाई के लिए भी खुला रखें
ऑडियो टेप में संदेश
पिछले महीने डेनमार्क के कुछ जाने-माने अख़बारों ने दोबारा इन कार्टूनों को छापा था।
ये कार्टून तब दोबार छपे जब डेनमार्क के ख़ुफ़िया विभाग ने दावा किया कि उसने कार्टून बनाने वाले व्यक्ति को जान से मारने के एक षड्यंत्र का पता लगाया है।
ओसामा का नया संदेश मिस्र की एक वेबसाइट पर देखा गया। इस साइट पर पहले भी अल क़ायदा के संदेश छापे जा चुके हैं।
महत्वपूर्ण है कि वर्ष 2008 में ये ओसामा का पहला संदेश है।
संदेश में कहा गया है कि पैगंबर मोहम्मद के कार्टून को दोबारा छापना पोप बेनेडिक्ट 16वें के क्रूसेड यानी ईसाइयों के धर्मयुद्ध का हिस्सा है।
उसमें आगे कहा गया है कि 'यूरोपीय महिलाओं और बच्चों पर हमले तो कुछ भी नहीं जब आप दूसरे की धारणाओं का अपमान करने में इतना आगे बढ़ जाएँ....कि आप उन अपमानजनक कार्टूनों को दोबारा छापें।'
ऑडियो टेप में कहा गया है - "ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और ख़तरनाक भी...यदि आपकी अभिव्यक्ति की आज़ादी की कोई हद नहीं है तो अपने दिलों को हमारी कार्रवाई के लिए भी खुला रखें।"
ये स्पष्ट नहीं है कि ये संदेश कब रिकॉर्ड हुआ है। उनका पिछला ऑडियो संदेश पिछली नवंबर में आया था लेकिन उन्हें अक्तूबर 2004 से वीडियो पर नहीं देखा गया है।
बताया गया है कि ये ऑडियो टेप में जो संदेश है वह ओसामा की आवाज़ में है लेकिन इसकी फ़िलहाल पुष्टि नहीं हो पाई है।
सितंबर 2005 में डेनमार्क के अख़बार ने 12 कार्टूनों की सिरीज़ प्रकाशित की थी जिसमें पैगंबर मोहम्मद को इस्लामी चरमपंथी के रूप में प्रदर्शित किया गया था। वर्ष 2006 में इस पर मुस्लिम जगत में गुस्सा भड़क उठा।
हालाँकि अख़ाबार ने इन कार्टूनों के लिए माफ़ी माँग ली लेकिन अरब देशों, दक्षिण एशियाई देशों और अफ़्रीकी देशों में भी मुसलमानों में इस विषय पर ख़ासा रोष सामने आया और सीरिया में डेनमार्क और नॉर्वे के दूतावासों में आग लगा दी गई थी।
दोबारा छपे कार्टून
ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और ख़तरनाक भी...यदि आपकी अभिव्यक्ति की आज़ादी की कोई हद नहीं है तो अपने दिलों को हमारी कार्रवाई के लिए भी खुला रखें
ऑडियो टेप में संदेश
पिछले महीने डेनमार्क के कुछ जाने-माने अख़बारों ने दोबारा इन कार्टूनों को छापा था।
ये कार्टून तब दोबार छपे जब डेनमार्क के ख़ुफ़िया विभाग ने दावा किया कि उसने कार्टून बनाने वाले व्यक्ति को जान से मारने के एक षड्यंत्र का पता लगाया है।
ओसामा का नया संदेश मिस्र की एक वेबसाइट पर देखा गया। इस साइट पर पहले भी अल क़ायदा के संदेश छापे जा चुके हैं।
महत्वपूर्ण है कि वर्ष 2008 में ये ओसामा का पहला संदेश है।
संदेश में कहा गया है कि पैगंबर मोहम्मद के कार्टून को दोबारा छापना पोप बेनेडिक्ट 16वें के क्रूसेड यानी ईसाइयों के धर्मयुद्ध का हिस्सा है।
उसमें आगे कहा गया है कि 'यूरोपीय महिलाओं और बच्चों पर हमले तो कुछ भी नहीं जब आप दूसरे की धारणाओं का अपमान करने में इतना आगे बढ़ जाएँ....कि आप उन अपमानजनक कार्टूनों को दोबारा छापें।'
ऑडियो टेप में कहा गया है - "ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और ख़तरनाक भी...यदि आपकी अभिव्यक्ति की आज़ादी की कोई हद नहीं है तो अपने दिलों को हमारी कार्रवाई के लिए भी खुला रखें।"
ये स्पष्ट नहीं है कि ये संदेश कब रिकॉर्ड हुआ है। उनका पिछला ऑडियो संदेश पिछली नवंबर में आया था लेकिन उन्हें अक्तूबर 2004 से वीडियो पर नहीं देखा गया है।
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Wednesday, March 19, 2008
अमरीकी, एशियाई शेयर बाज़ारों में सुधार
अमरीका के केंद्रीय बैंक फ़ेडरल रिज़र्व के ब्याज दरों में 0.75 प्रतिशत की कटौती के बाद पहले अमरीकी और फिर एशियाई शेयर बाज़ारों में ख़ासा सुधार आया है।
न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज का डाओ जोन्स इंडेक्स में 420 अंकों का उछाल आया और वह मंगलवार को 3.51 प्रतिशत ऊपर यानी 12392 अंकों पर बंद हुआ।
ये पिछले पाँच साल में डाओ जोन्स सूचकांक में किसी एक दिन में आया सबसे अधिक उछाल है।
पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस उछाल से ये अनुमान नहीं लगाया जाना चाहिए कि ऋण का संकट ख़त्म हो गया है।
उनका कहना है कि ये केवल इतना दर्शाता है कि निवेशकों को भरोसा है कि अमरीकी केंद्रीय बैंक का अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण कायम है।
अमरीका का केंद्रीय बैंक फ़ेडरल रिज़र्व जो क़दम उठा रहा है, उससे संभावना है कि इस साल में आगे चल कर अर्थव्यवस्था सुधर जाएगी
डेल्टा ग्लोबल एडवाइसर्ज़
अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाली कंपनी डेल्टा ग्लोबल एडवाइसर्ज़ के अध्यक्ष चिप हेनलॉन का कहना था, "अमरीका का केंद्रीय बैंक फ़ेडरल रिज़र्व जो क़दम उठा रहा है, उससे संभावना है कि इस साल में आगे चल कर अर्थव्यवस्था सुधर जाएगी।"
एशियाई बाज़ारों में उछाल
इससे पहले यूरोप में भी शेयर बाज़ारों की स्थिति संभली थी और लंदन के फ़ुट्सी-100 इंडेक्स में 3.54 प्रतिशत का उछाल आया था।
बुधवार को एशियाई शेयर बाज़ारों में भी अमरीका के केंद्रीय बैंक की ब्याज दर में कटौती की घोषणा और डाओ जोन्स में आए सुधार का असर देखने को मिला।
शेयर बाज़ार खुलने के बाद शुरुआती कारोबार में बुधवार को जापान का निक्केई शेयर सूचकांक तीन प्रतिशत ऊपर गया जबकि ऑस्ट्रेलिया, ताइवान और दक्षिण कोरिया के शेयर बाज़ारों में दो प्रतिशत तक का उछाल देखने को मिला।
न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज का डाओ जोन्स इंडेक्स में 420 अंकों का उछाल आया और वह मंगलवार को 3.51 प्रतिशत ऊपर यानी 12392 अंकों पर बंद हुआ।
ये पिछले पाँच साल में डाओ जोन्स सूचकांक में किसी एक दिन में आया सबसे अधिक उछाल है।
पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस उछाल से ये अनुमान नहीं लगाया जाना चाहिए कि ऋण का संकट ख़त्म हो गया है।
उनका कहना है कि ये केवल इतना दर्शाता है कि निवेशकों को भरोसा है कि अमरीकी केंद्रीय बैंक का अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण कायम है।
अमरीका का केंद्रीय बैंक फ़ेडरल रिज़र्व जो क़दम उठा रहा है, उससे संभावना है कि इस साल में आगे चल कर अर्थव्यवस्था सुधर जाएगी
डेल्टा ग्लोबल एडवाइसर्ज़
अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाली कंपनी डेल्टा ग्लोबल एडवाइसर्ज़ के अध्यक्ष चिप हेनलॉन का कहना था, "अमरीका का केंद्रीय बैंक फ़ेडरल रिज़र्व जो क़दम उठा रहा है, उससे संभावना है कि इस साल में आगे चल कर अर्थव्यवस्था सुधर जाएगी।"
एशियाई बाज़ारों में उछाल
इससे पहले यूरोप में भी शेयर बाज़ारों की स्थिति संभली थी और लंदन के फ़ुट्सी-100 इंडेक्स में 3.54 प्रतिशत का उछाल आया था।
बुधवार को एशियाई शेयर बाज़ारों में भी अमरीका के केंद्रीय बैंक की ब्याज दर में कटौती की घोषणा और डाओ जोन्स में आए सुधार का असर देखने को मिला।
शेयर बाज़ार खुलने के बाद शुरुआती कारोबार में बुधवार को जापान का निक्केई शेयर सूचकांक तीन प्रतिशत ऊपर गया जबकि ऑस्ट्रेलिया, ताइवान और दक्षिण कोरिया के शेयर बाज़ारों में दो प्रतिशत तक का उछाल देखने को मिला।
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Monday, March 17, 2008
'तिब्बतियों पर गोली नहीं चलाई गई'
एक वरिष्ठ चीनी अधिकारी ने इस बात से इनकार किया है कि तिब्बत के शहर ल्हासा में प्रदर्शनकारियों पर घातक हथियारों का प्रयोग किया गया।
तिब्बत के क्षेत्रीय गवर्नर क्यूंग्बा पुनकॉग का कहना था कि जैसे जैसे प्रदर्शनकारियों के लिए समयसीमा निकट आती जा रही है, शांति वापस लौट रही है।
उनका कहना था कि प्रदर्शन के दौरान 13 लोगों की मौत हुई जबकि दलाई लामा का कहना है कि चीन की कार्रवाई में कम से कम 80 लोग मारे गए।
पत्रकारों से बातचीत में तिब्बत के गवर्नर ने कहा कि सुरक्षा बलों ने घातक हथियारों का प्रयोग नहीं किया।
उनका कहना था, '' मैं एक ज़िम्मेदार अधिकारी होने के नाते कह सकता हूँ कि गोली बिल्कुल नहीं चलाई गई।''
मैं एक ज़िम्मेदार अधिकारी होने के नाते कह सकता हूँ कि गोली बिल्कुल नहीं चलाई गई
तिब्बत के गवर्नर
दूसरी ओर ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि ल्हासा में हिंसक प्रदर्शनों के बाद तिब्बतियों का आंदोलन कई अन्य प्रांतों में फैल गया है।
अबा और सिचुआन प्रांतों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ। इस दौरान पुलिस चौकी पर भी हमला किया गया।
उल्लेखनीय है कि तिब्बत में चीन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों को वहाँ के अधिकारियों ने आत्मसमर्पण करने के लिए सोमवार तक का समय दिया है।
चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ के हवाले से आए एक बयान में सरकार ने कहा है कि लोग सोमवार आधी रात तक ख़ुद को प्रशासन के हवाले कर दें। प्रशासन का कहना है कि ऐसे लोगों के प्रति नरमी बरती जाएगी।
चीन सरकार ने कहा है कि तिब्बत की राजधानी ल्हासा में स्थितियां अब लगभग नियंत्रित हो चुकी है।
इस दौरान भारी हथियारों से लैस सैकड़ों की संख्या में पुलिसकर्मी शहर की सड़कों पर गश्त लगा रहे हैं।
चीन सरकार ने विदेशी लोगों को ल्हासा छो़ड़ने की सलाह दी है और जो पर्यटक वहाँ आना चाहते थे, उनकी यात्राओं को निलंबित कर दिया गया है।
दलाई लामा की चिंता
दूसरी ओर तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रमुख और आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने कहा है कि चीन ने तिब्बत में जो हिंसा की है उसकी जाँच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होनी चाहिए।
दलाई लामा
दलाई लामा ने तिब्बत की हिंसा की अंतरराष्ट्रीय जाँच की माँग की है
उन्होंने तिब्बत में मारे गए प्रदर्शनकारियों के लिए चीन को आड़े हाथों लेते हुए इसे 'सांस्कृतिक जनसंहार' करार दिया है।
दलाई लामा ने कहा कि चीन सरकार ने प्रदर्शनकारियों के आत्मसमर्पण के लिए सोमवार तक की जो समयसीमा तय की है, उसे लेकर वो ख़ासे चिंतित हैं और असहाय महसूस कर रहे हैं।
तिब्बती गुरू ने आशंका व्यक्त की कि अभी तक प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाइयों में 100 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं।
हालांकि चीन सरकार का कहना है कि इस हिंसा में कुल 10 लोग ही मारे गए हैं।
मारे गए प्रदर्शनकारियों को श्रद्धांजलि देने के लिए भारत में धर्मशाला स्थित निर्वासित तिब्बती सरकार के लोगों ने हाथों में मोमबत्तियां लेकर एक शांतिमार्च निकाला।
दलाई लामा ने आशंका जताई है कि यदि चीन अपनी नीति नहीं बदलता है तो तिब्बत में और मौतें हो सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को ल्हासा में हुए हिंसक प्रदर्शन के दौरान कई लोग हताहत हुए थे।
अमरीका सहित दुनिया के कई देशों ने चीन से संयम बरतने की अपील की है।
सन् 1989 के बाद से तिब्बत में हुई ये सबसे बड़ी हिंसक घटना है।
तिब्बत के क्षेत्रीय गवर्नर क्यूंग्बा पुनकॉग का कहना था कि जैसे जैसे प्रदर्शनकारियों के लिए समयसीमा निकट आती जा रही है, शांति वापस लौट रही है।
उनका कहना था कि प्रदर्शन के दौरान 13 लोगों की मौत हुई जबकि दलाई लामा का कहना है कि चीन की कार्रवाई में कम से कम 80 लोग मारे गए।
पत्रकारों से बातचीत में तिब्बत के गवर्नर ने कहा कि सुरक्षा बलों ने घातक हथियारों का प्रयोग नहीं किया।
उनका कहना था, '' मैं एक ज़िम्मेदार अधिकारी होने के नाते कह सकता हूँ कि गोली बिल्कुल नहीं चलाई गई।''
मैं एक ज़िम्मेदार अधिकारी होने के नाते कह सकता हूँ कि गोली बिल्कुल नहीं चलाई गई
तिब्बत के गवर्नर
दूसरी ओर ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि ल्हासा में हिंसक प्रदर्शनों के बाद तिब्बतियों का आंदोलन कई अन्य प्रांतों में फैल गया है।
अबा और सिचुआन प्रांतों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ। इस दौरान पुलिस चौकी पर भी हमला किया गया।
उल्लेखनीय है कि तिब्बत में चीन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों को वहाँ के अधिकारियों ने आत्मसमर्पण करने के लिए सोमवार तक का समय दिया है।
चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ के हवाले से आए एक बयान में सरकार ने कहा है कि लोग सोमवार आधी रात तक ख़ुद को प्रशासन के हवाले कर दें। प्रशासन का कहना है कि ऐसे लोगों के प्रति नरमी बरती जाएगी।
चीन सरकार ने कहा है कि तिब्बत की राजधानी ल्हासा में स्थितियां अब लगभग नियंत्रित हो चुकी है।
इस दौरान भारी हथियारों से लैस सैकड़ों की संख्या में पुलिसकर्मी शहर की सड़कों पर गश्त लगा रहे हैं।
चीन सरकार ने विदेशी लोगों को ल्हासा छो़ड़ने की सलाह दी है और जो पर्यटक वहाँ आना चाहते थे, उनकी यात्राओं को निलंबित कर दिया गया है।
दलाई लामा की चिंता
दूसरी ओर तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रमुख और आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने कहा है कि चीन ने तिब्बत में जो हिंसा की है उसकी जाँच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होनी चाहिए।
दलाई लामा
दलाई लामा ने तिब्बत की हिंसा की अंतरराष्ट्रीय जाँच की माँग की है
उन्होंने तिब्बत में मारे गए प्रदर्शनकारियों के लिए चीन को आड़े हाथों लेते हुए इसे 'सांस्कृतिक जनसंहार' करार दिया है।
दलाई लामा ने कहा कि चीन सरकार ने प्रदर्शनकारियों के आत्मसमर्पण के लिए सोमवार तक की जो समयसीमा तय की है, उसे लेकर वो ख़ासे चिंतित हैं और असहाय महसूस कर रहे हैं।
तिब्बती गुरू ने आशंका व्यक्त की कि अभी तक प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाइयों में 100 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं।
हालांकि चीन सरकार का कहना है कि इस हिंसा में कुल 10 लोग ही मारे गए हैं।
मारे गए प्रदर्शनकारियों को श्रद्धांजलि देने के लिए भारत में धर्मशाला स्थित निर्वासित तिब्बती सरकार के लोगों ने हाथों में मोमबत्तियां लेकर एक शांतिमार्च निकाला।
दलाई लामा ने आशंका जताई है कि यदि चीन अपनी नीति नहीं बदलता है तो तिब्बत में और मौतें हो सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को ल्हासा में हुए हिंसक प्रदर्शन के दौरान कई लोग हताहत हुए थे।
अमरीका सहित दुनिया के कई देशों ने चीन से संयम बरतने की अपील की है।
सन् 1989 के बाद से तिब्बत में हुई ये सबसे बड़ी हिंसक घटना है।
Saturday, March 15, 2008
प्रदर्शनों के लिए दलाई लामा को दोष
तिब्बत की राजधानी ल्हासा में पिछले बीस सालों में सबसे हिंसक चीन विरोधी दंगे और हिंसक प्रदर्शन हुए हैं।
प्रदर्शनकारियों ने पुराने शहर में इमारतों में आग लगा दी है, चीनी मूल के व्यापारियों की दुकानें लूट ली गई हैं और उनकी दुकानों को नष्ट कर दिया गया है।
ल्हासा से मिल रही तस्वीरों में सड़कों पर उल्टी पड़ी कारें दिख रही हैं, यहाँ-वहाँ आग लगने के बाद उठता काला धुँआ दिख रहा है और सड़कों पर चीनी फ़ौजें और बख़्तरबंद गाड़ियाँ दिखाई दे रही हैं।
इन हिंसक प्रदर्शनों में कई लोगों के मारे जाने की ख़बरें हैं।
चीन सरकार ने इन उग्र प्रदर्शनों के लिए तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रमुख और धार्मिक नेता दलाई लामा को दोषी ठहराया है।
लेकिन दलाई लामा के प्रवक्ता ने दिल्ली में इन आरोपों का खंडन किया है।
इस बीच ख़बरें मिल रही हैं कि तिब्बत के घटनाक्रम से चीन के लोग नावाकिफ़ हैं क्योंकि सरकार ने इन ख़बरों को सेंसर कर दिया है।
पिछले सोमवार से तिब्बती लोगों का प्रदर्शन ऐसे समय में शुरु हुआ है जब चीन सरकार ओलंपिक की तैयारियों में लगी हुई है।
इस बीच अमरीका और यूरोपीय संघ ने घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि चीन को तिब्बत के निर्वासित नेता दलाई लामा से बात करनी चाहिए।
हिंसक प्रदर्शन
इस बीच तिब्बति प्रदर्शनकारी विरोध प्रदर्शनों को आगे बढ़ाने की तैयारियाँ कर रहे हैं।
हिंसक प्रदर्शन
ल्हासा में हो रहे प्रदर्शनों को 20 सालों में सबसे बड़े प्रदर्शन माने जा रहे हैं
लेकिन चीनी प्रशासन ने कहा है कि 'अलगाव की षडयंत्र' से सख़्ती से निपटा जाएगा।
चीन प्रशासन ने इन ख़बरों का खंडन किया है कि वहाँ प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षाबलों ने गोलियाँ चलाई हैं।
उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को ल्हासा में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच हुए संघर्ष में कई लोगों की मौत हुई है और अनेक घायल हुए हैं।
अमरीकी रेडियो फ्री एशिया को प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि उन्होंने ल्हासा की सड़कों पर दो लोगों के शव पड़े देखे हैं।
उधर भारत की राजधानी दिल्ली में पुलिस ने ऐसे लगभग 50 तिब्बती प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार कर लिया जिन्होंने चीनी दूतावास में घुसने की कोशिश की।
अशांत स्थिति
मानवाधिकार संगठनों और प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि ल्हासा में बौद्ध भिक्षुओं के इस सप्ताह शुरू हुए विरोध के बाद सुरक्षा बलों ने शुक्रवार को तीन बौद्ध मठों को घेर लिया।
चश्मदीदों का कहना था कि गुरुवार को ड्रेपुंग और सेरा मठों में पुलिस पहुँच गई। अमरीका से काम करने वाले एक मानवाधिकार संगठन का कहना है कि गंडेन में एक तीसरे मठ को भी घेरा गया।
चीनी शासन के विरोध में बौद्ध भिक्षुओं के दो दिनों तक चले विरोध के बाद यह क़दम उठाया गया।
गुरुवार को चीन ने बौद्ध भिक्षुओं के प्रदर्शन की बातें तो मानी थीं लेकिन यह भी कहा था कि हालात स्थिर हैं।
तिब्बत से किसी भी ख़बर की पुष्टि कर पाना मुश्किल है क्योंकि वहाँ मीडिया और आने-जाने वालों पर कड़ा सरकारी नियंत्रण है।
ख़बरें हैं कि प्रदर्शन की ख़बरों को चीन सरकार ने देशी मीडिया पर सेंसर कर दिया है। सरकारी टेलीविज़न सीसीटीवी पर इन प्रदर्शनों की कोई ख़बर नहीं दिखाई गई।
इस बीच विदेशी चैनलों पर नज़र रखी जा रही है।
जब भी तिब्बत का ज़िक्र होता है तो चीन सरकार का रवैया आमतौर पर ऐसा ही होता है।
लामा पर दोष
चीन ने ल्हासा की घटनाओं के लिए दलाई लामा को ज़िम्मेदार ठहराया है।
दलाई लामा
दलाई लामा ने प्रदर्शनों को तिब्ब्तियों के असंतोष का प्रतीक बताया है
चीन के सरकारी मीडिया ने कहा है कि ये प्रदर्शन 'पूर्वनियोजित' थे और इसके पीछे दलाई लामा हैं।
लेकिन दलाई लामा के प्रवक्ता चाइम आर छोयकयापा ने दिल्ली में इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है।
उनका कहना है कि चीन सरकार तिब्बतियों की समस्या को बंदूक से नहीं सुलझा सकती और उसे तिब्बतियों का मन पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।
उधर तिब्बतियों के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने कहा है कि ल्हासा की स्थिति को लेकर वो गंभीर रूप से चिंतित हैं।
दलाई लामा ने एक प्रेस वक्तव्य जारी करके चीन से माँग की है वह ल्हासा में बर्बर तरीके से बलप्रयोग करना बंद करे।
उन्होंने कहा है कि तिब्बतियों ने जो प्रदर्शन किए हैं वो चीनी शासन के ख़िलाफ़ लंबे समय से चले आ रहे असंतोष का प्रतीक हैं।
प्रदर्शनकारियों ने पुराने शहर में इमारतों में आग लगा दी है, चीनी मूल के व्यापारियों की दुकानें लूट ली गई हैं और उनकी दुकानों को नष्ट कर दिया गया है।
ल्हासा से मिल रही तस्वीरों में सड़कों पर उल्टी पड़ी कारें दिख रही हैं, यहाँ-वहाँ आग लगने के बाद उठता काला धुँआ दिख रहा है और सड़कों पर चीनी फ़ौजें और बख़्तरबंद गाड़ियाँ दिखाई दे रही हैं।
इन हिंसक प्रदर्शनों में कई लोगों के मारे जाने की ख़बरें हैं।
चीन सरकार ने इन उग्र प्रदर्शनों के लिए तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रमुख और धार्मिक नेता दलाई लामा को दोषी ठहराया है।
लेकिन दलाई लामा के प्रवक्ता ने दिल्ली में इन आरोपों का खंडन किया है।
इस बीच ख़बरें मिल रही हैं कि तिब्बत के घटनाक्रम से चीन के लोग नावाकिफ़ हैं क्योंकि सरकार ने इन ख़बरों को सेंसर कर दिया है।
पिछले सोमवार से तिब्बती लोगों का प्रदर्शन ऐसे समय में शुरु हुआ है जब चीन सरकार ओलंपिक की तैयारियों में लगी हुई है।
इस बीच अमरीका और यूरोपीय संघ ने घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि चीन को तिब्बत के निर्वासित नेता दलाई लामा से बात करनी चाहिए।
हिंसक प्रदर्शन
इस बीच तिब्बति प्रदर्शनकारी विरोध प्रदर्शनों को आगे बढ़ाने की तैयारियाँ कर रहे हैं।
हिंसक प्रदर्शन
ल्हासा में हो रहे प्रदर्शनों को 20 सालों में सबसे बड़े प्रदर्शन माने जा रहे हैं
लेकिन चीनी प्रशासन ने कहा है कि 'अलगाव की षडयंत्र' से सख़्ती से निपटा जाएगा।
चीन प्रशासन ने इन ख़बरों का खंडन किया है कि वहाँ प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षाबलों ने गोलियाँ चलाई हैं।
उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को ल्हासा में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच हुए संघर्ष में कई लोगों की मौत हुई है और अनेक घायल हुए हैं।
अमरीकी रेडियो फ्री एशिया को प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि उन्होंने ल्हासा की सड़कों पर दो लोगों के शव पड़े देखे हैं।
उधर भारत की राजधानी दिल्ली में पुलिस ने ऐसे लगभग 50 तिब्बती प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार कर लिया जिन्होंने चीनी दूतावास में घुसने की कोशिश की।
अशांत स्थिति
मानवाधिकार संगठनों और प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि ल्हासा में बौद्ध भिक्षुओं के इस सप्ताह शुरू हुए विरोध के बाद सुरक्षा बलों ने शुक्रवार को तीन बौद्ध मठों को घेर लिया।
चश्मदीदों का कहना था कि गुरुवार को ड्रेपुंग और सेरा मठों में पुलिस पहुँच गई। अमरीका से काम करने वाले एक मानवाधिकार संगठन का कहना है कि गंडेन में एक तीसरे मठ को भी घेरा गया।
चीनी शासन के विरोध में बौद्ध भिक्षुओं के दो दिनों तक चले विरोध के बाद यह क़दम उठाया गया।
गुरुवार को चीन ने बौद्ध भिक्षुओं के प्रदर्शन की बातें तो मानी थीं लेकिन यह भी कहा था कि हालात स्थिर हैं।
तिब्बत से किसी भी ख़बर की पुष्टि कर पाना मुश्किल है क्योंकि वहाँ मीडिया और आने-जाने वालों पर कड़ा सरकारी नियंत्रण है।
ख़बरें हैं कि प्रदर्शन की ख़बरों को चीन सरकार ने देशी मीडिया पर सेंसर कर दिया है। सरकारी टेलीविज़न सीसीटीवी पर इन प्रदर्शनों की कोई ख़बर नहीं दिखाई गई।
इस बीच विदेशी चैनलों पर नज़र रखी जा रही है।
जब भी तिब्बत का ज़िक्र होता है तो चीन सरकार का रवैया आमतौर पर ऐसा ही होता है।
लामा पर दोष
चीन ने ल्हासा की घटनाओं के लिए दलाई लामा को ज़िम्मेदार ठहराया है।
दलाई लामा
दलाई लामा ने प्रदर्शनों को तिब्ब्तियों के असंतोष का प्रतीक बताया है
चीन के सरकारी मीडिया ने कहा है कि ये प्रदर्शन 'पूर्वनियोजित' थे और इसके पीछे दलाई लामा हैं।
लेकिन दलाई लामा के प्रवक्ता चाइम आर छोयकयापा ने दिल्ली में इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है।
उनका कहना है कि चीन सरकार तिब्बतियों की समस्या को बंदूक से नहीं सुलझा सकती और उसे तिब्बतियों का मन पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।
उधर तिब्बतियों के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने कहा है कि ल्हासा की स्थिति को लेकर वो गंभीर रूप से चिंतित हैं।
दलाई लामा ने एक प्रेस वक्तव्य जारी करके चीन से माँग की है वह ल्हासा में बर्बर तरीके से बलप्रयोग करना बंद करे।
उन्होंने कहा है कि तिब्बतियों ने जो प्रदर्शन किए हैं वो चीनी शासन के ख़िलाफ़ लंबे समय से चले आ रहे असंतोष का प्रतीक हैं।
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Friday, March 14, 2008
सोनिया के अध्यक्ष के रूप में 10 साल
सोनिया गांधी शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में 10 साल पूरे कर एक कीर्तिमान स्थापित करने जा रही हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में गुरुवार को कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों की एक बैठक हुई जिसमें एक प्रस्ताव पारित कर पार्टी में उनके योगदान की प्रशंसा की गई।
कांग्रेस नेता प्रणव मुखर्जी ने कहा,'' हम पार्टी को नेतृत्व प्रदान करने के लिए उनका आभार व्यक्त करते हैं। ये कांग्रेस के 122 साल के इतिहास में ऐतिहासिक क्षण हैं।''
हम पार्टी को नेतृत्व प्रदान करने के लिए उनका आभार व्यक्त करते हैं. ये कांग्रेस के 122 साल के इतिहास में ऐतिहासिक क्षण हैं
कांग्रेस नेता प्रणव मुखर्जी
सोनिया गांधी ने 1998 में सीताराम केसरी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष का पद उस वक्त संभाला था जब भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) केंद्र में सत्ता में था।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सोनिया का सबसे बड़ा योगदान ये रहा कि उन्होंने न केवल संकट के दिनों में पार्टी को एकजुट बनाये रखा बल्कि धीरे-धीरे उसे सत्तावापसी की राह पर भी वापस ला दिया।
लंबा कार्यकाल
जब सोनिया इंदिरा गांधी की बहू बनी थीं उस वक्त उन्हें राजनीति में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन दिलचस्प तथ्य ये है कि गांधी नेहरू परिवार के अन्य सदस्यों की तुलना में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सबसे लंबा कार्यकाल पूरा किया है।
सोनिया गांधी
सोनिया गांधी को विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर कटु आलोचना झेलनी पड़ी है
पार्टी नेता जनार्दन द्विवेदी का कहना है कि कांग्रेस के 122 साल के इतिहास में पार्टी के किसी अध्यक्ष ने इतना लंबा और सफल कार्यकाल पूरा नहीं किया।
सोनिया ने मई, 2004 में हुए लोकसभा चुनावों के पहले ग़ैर भाजपा दलों को एक मंच पर लाकर एक तरह से यह सुनिश्चित कर दिया कि एनडीए सत्ता में वापस न आए।
सोनिया गांधी को कड़े विरोध का सामना भी करना पड़ा है। विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर उन्हें विरोधियों की कटु आलोचना झेलनी पड़ी है।
साथ ही मेनका गांधी जैसे परिवार के अन्य सदस्यों की चुनौती का भी सामना करना पड़ा है।
उन्होंने मई, 2004 में लोक सभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री का पद स्वीकार न कर काफ़ी लोकप्रियता अर्जित की।
लाभ के पद को लेकर उठे विवाद के बाद सोनिया गांधी ने अपनी रायबरेली सीट से इस्तीफ़ा दे दिया था और वो वहाँ से फिर चुनाव जीतीं।
कांग्रेस अध्यक्ष होने के साथ-साथ सोनिया राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) की भी अध्यक्ष हैं और उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि विभिन्न दबावों के बावजूद गठबंधन ठीक तरह से चलता रहे।
ये बात इसलिए भी अहम है क्योंकि कांग्रेस ने पहली बार अन्य दलों के साथ मिलकर केंद्र में गठबंधन सरकार बनाई है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में गुरुवार को कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों की एक बैठक हुई जिसमें एक प्रस्ताव पारित कर पार्टी में उनके योगदान की प्रशंसा की गई।
कांग्रेस नेता प्रणव मुखर्जी ने कहा,'' हम पार्टी को नेतृत्व प्रदान करने के लिए उनका आभार व्यक्त करते हैं। ये कांग्रेस के 122 साल के इतिहास में ऐतिहासिक क्षण हैं।''
हम पार्टी को नेतृत्व प्रदान करने के लिए उनका आभार व्यक्त करते हैं. ये कांग्रेस के 122 साल के इतिहास में ऐतिहासिक क्षण हैं
कांग्रेस नेता प्रणव मुखर्जी
सोनिया गांधी ने 1998 में सीताराम केसरी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष का पद उस वक्त संभाला था जब भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) केंद्र में सत्ता में था।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सोनिया का सबसे बड़ा योगदान ये रहा कि उन्होंने न केवल संकट के दिनों में पार्टी को एकजुट बनाये रखा बल्कि धीरे-धीरे उसे सत्तावापसी की राह पर भी वापस ला दिया।
लंबा कार्यकाल
जब सोनिया इंदिरा गांधी की बहू बनी थीं उस वक्त उन्हें राजनीति में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन दिलचस्प तथ्य ये है कि गांधी नेहरू परिवार के अन्य सदस्यों की तुलना में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सबसे लंबा कार्यकाल पूरा किया है।
सोनिया गांधी
सोनिया गांधी को विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर कटु आलोचना झेलनी पड़ी है
पार्टी नेता जनार्दन द्विवेदी का कहना है कि कांग्रेस के 122 साल के इतिहास में पार्टी के किसी अध्यक्ष ने इतना लंबा और सफल कार्यकाल पूरा नहीं किया।
सोनिया ने मई, 2004 में हुए लोकसभा चुनावों के पहले ग़ैर भाजपा दलों को एक मंच पर लाकर एक तरह से यह सुनिश्चित कर दिया कि एनडीए सत्ता में वापस न आए।
सोनिया गांधी को कड़े विरोध का सामना भी करना पड़ा है। विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर उन्हें विरोधियों की कटु आलोचना झेलनी पड़ी है।
साथ ही मेनका गांधी जैसे परिवार के अन्य सदस्यों की चुनौती का भी सामना करना पड़ा है।
उन्होंने मई, 2004 में लोक सभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री का पद स्वीकार न कर काफ़ी लोकप्रियता अर्जित की।
लाभ के पद को लेकर उठे विवाद के बाद सोनिया गांधी ने अपनी रायबरेली सीट से इस्तीफ़ा दे दिया था और वो वहाँ से फिर चुनाव जीतीं।
कांग्रेस अध्यक्ष होने के साथ-साथ सोनिया राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) की भी अध्यक्ष हैं और उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि विभिन्न दबावों के बावजूद गठबंधन ठीक तरह से चलता रहे।
ये बात इसलिए भी अहम है क्योंकि कांग्रेस ने पहली बार अन्य दलों के साथ मिलकर केंद्र में गठबंधन सरकार बनाई है।
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Thursday, March 13, 2008
प्रदूषण कम करने अमरीका में नए नियम
अमरीका में पर्यावरण की रक्षा के लिए बनी एजेंसी (ईपीए) ने लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए वायु प्रदूषण कम करने के लिए कड़े प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला किया है।
नए प्रतिबंधों के अनुसार स्मॉग यानी धुँए और कोहरे के मिश्रण को कम करने के लिए राज्यों को नए उपाय तलाशने होंगे।
पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि नए प्रतिबंध भी पर्याप्त नहीं हैं।
लेकिन उद्योगों ने कहा है कि नए नियमों से उनका ख़र्च बढ़ेगा।
नए नियम
पर्यावरण की रक्षा के लिए बनी एजेंसी पर लंबे समय से दबाव था कि वह वायु की शुद्धता को बढ़ाने के उपाय करे।
लेकिन बुश प्रशासन पर उद्योगों का दबाव था कि वह बहुत कड़े नियम लागू न करे।
हो सकता है कि नियम कड़े हों, लेकिन यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम वायु की शुद्धता बढ़ाने के लिए वादों को कागज़ों से निकालकर हक़ीकत में लागू करें
स्टीफ़न एल जॉनसन, ईपीए के प्रशासक
नए प्रतिबंधों के हिसाब से हवा में ओज़ोन की मात्रा प्रति अरब इकाइयों में 80 इकाई से घटाकर 75 करना होगा।
नए नियमों में कहा गया है कि इसके बाद ही हवा को स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त माना जा सकेगा।
हालांकि ईपीए के वैज्ञानिकों ने एकमत होकर यह सिफ़ारिश की थी कि ओज़ोन की मात्रा को 70 इकाई तक कर दिया जाए।
ईपीए का अनुमान है कि नए नियम लागू होने से अमरीका में कोई चार हज़ार लोगों की समयपूर्व मृत्यु को रोका जा सकेगा और सात हज़ार लोगों को अस्पताल जाने से बचाया जा सकेगा।
कड़े नियमों के बारे में ईपीए के प्रशासक स्टीफ़न एल जॉनसन ने कहा, "हो सकता है कि नियम कड़े हों, लेकिन यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम वायु की शुद्धता बढ़ाने के लिए वादों को कागज़ों से निकालकर हक़ीकत में लागू करें।"
बहुत से वैज्ञानिक मानते हैं कि नए नियमों से प्रदूषण की वजह से स्वास्थ्य के लिए पैदा हो रहा ख़तरा बहुत कम नहीं होने वाला है।
अमरीका में वायु की शुद्धता के लिए काम करने वाली संस्था 'क्लीन एयर वॉच' का भी कहना है कि नए नियम पर्याप्त नहीं है।
नए प्रतिबंधों के अनुसार स्मॉग यानी धुँए और कोहरे के मिश्रण को कम करने के लिए राज्यों को नए उपाय तलाशने होंगे।
पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि नए प्रतिबंध भी पर्याप्त नहीं हैं।
लेकिन उद्योगों ने कहा है कि नए नियमों से उनका ख़र्च बढ़ेगा।
नए नियम
पर्यावरण की रक्षा के लिए बनी एजेंसी पर लंबे समय से दबाव था कि वह वायु की शुद्धता को बढ़ाने के उपाय करे।
लेकिन बुश प्रशासन पर उद्योगों का दबाव था कि वह बहुत कड़े नियम लागू न करे।
हो सकता है कि नियम कड़े हों, लेकिन यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम वायु की शुद्धता बढ़ाने के लिए वादों को कागज़ों से निकालकर हक़ीकत में लागू करें
स्टीफ़न एल जॉनसन, ईपीए के प्रशासक
नए प्रतिबंधों के हिसाब से हवा में ओज़ोन की मात्रा प्रति अरब इकाइयों में 80 इकाई से घटाकर 75 करना होगा।
नए नियमों में कहा गया है कि इसके बाद ही हवा को स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त माना जा सकेगा।
हालांकि ईपीए के वैज्ञानिकों ने एकमत होकर यह सिफ़ारिश की थी कि ओज़ोन की मात्रा को 70 इकाई तक कर दिया जाए।
ईपीए का अनुमान है कि नए नियम लागू होने से अमरीका में कोई चार हज़ार लोगों की समयपूर्व मृत्यु को रोका जा सकेगा और सात हज़ार लोगों को अस्पताल जाने से बचाया जा सकेगा।
कड़े नियमों के बारे में ईपीए के प्रशासक स्टीफ़न एल जॉनसन ने कहा, "हो सकता है कि नियम कड़े हों, लेकिन यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम वायु की शुद्धता बढ़ाने के लिए वादों को कागज़ों से निकालकर हक़ीकत में लागू करें।"
बहुत से वैज्ञानिक मानते हैं कि नए नियमों से प्रदूषण की वजह से स्वास्थ्य के लिए पैदा हो रहा ख़तरा बहुत कम नहीं होने वाला है।
अमरीका में वायु की शुद्धता के लिए काम करने वाली संस्था 'क्लीन एयर वॉच' का भी कहना है कि नए नियम पर्याप्त नहीं है।
Wednesday, March 12, 2008
भारत में हवाईअड्डा कर्मचारियों की देशव्यापी 'हड़ताल'
बुधवार का दिन भारत में विमानयात्राएं करने वालों के लिए कठिन और कष्टप्रद हो सकता है क्योंकि भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के कर्मचारियों ने देशव्यापी हड़ताल शुरू कर दी है।
अपनी चेतावनी के अनुसार ही क़रीब 14 हज़ार हवाईअड्डा कर्मचारियों ने मंगलवार को मध्यरात्रि से ही अपनी हड़ताल शुरू कर दी है।
हालांकि हड़ताल पर अदालती रोक के मद्देनज़र कर्मचारी यूनियनों ने इसे हड़ताल के बजाय 'असहयोग' का नाम दिया है।
कर्मचारी बंगलौर और हैदराबाद के हवाईअड्डों को निजी हवाईअड्डों के कामकाज लायक होने के बाद बंद किए जाने के फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं और इसे वापस लेने की माँग कर रहे हैं।
पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने कर्मचारियों की ओर से की जा रही इस माँग को मानने से इनकार कर दिया है। उधर हड़ताल के मद्देनज़र ज़रूरी सेवाओं संबंधी क़ानून (ईएसएमए) लागू कर दिया गया है ताकि कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने से रोका जा सके।
देश के 127 हवाईअड्डे प्राधिकरण के अधीन हैं और कर्मचारियों की हड़ताल से इन हवाईअड्डों पर कामकाज प्रभावित हो सकता है।
हालांकि सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक तैयारी कर ली है। भारतीय वायुसेना के 479 कर्मियों को देश के 21 महत्वपूर्ण हवाईअड्डों पर तैनात कर दिया गया है।
इनमें दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता, चेन्नई और बंगलौर के हवाईअड्डे भी शामिल हैं ताकि हवाई यातायात को ठप होने से रोका जा सके और स्थितियां नियंत्रण में रहें।
इससे पहले मंगलवार की शाम भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के आलाअधिकारियों ने कर्मचारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत की ताकि हड़ताल को टाला जा सके पर यह कोशिश नाकामयाब ही रही।
निजीकरण का विरोध
नागरिक उड्डयन मंत्रालय के संयुक्त सचिव एएन श्रीवास्तव ने कहा है कि कर्मचारियों को दिल्ली हाईकोर्ट का वह फैसला ध्यान में रखना चाहिए जिसमें हड़ताल करने और धरने-प्रदर्शन पर रोक लगा रखी गई है। यूनियनें इस बात को ध्यान में रखते हुए फ़ैसला लें।
नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल
कर्मचारियों की माँग है कि सरकार निजीकरण को रोके
पर हड़ताल पर गए कर्मचारियों का कहना है कि सरकार बंगलौर और हैदराबाद के हवाईअड्डों को भविष्य में बंद करने का फ़ैसला वापस ले और निजी हवाईअड्डों को प्रभावी न बनाया जाए।
कर्मचारियों की यूनियनों के संयुक्त मोर्चे के नेता एमके घोषाल ने चिंता व्यक्त की कि अगर ऐसा होता है तो केवल कर्मचारियों को ही नहीं बल्कि प्राधिकरण को भी काफी नुकसान होगा और एक समय के बाद प्राधिकरण निस्प्रभावी हो जाएगा।
हालांकि हड़ताल शुरू होने के बाद से अभी तक कहीं से किसी कठिनाई या हवाई यातायात के प्रभावित होने की ख़बरें नहीं आई हैं पर दिन चढ़ने के बाद इसका असर बढ़ सकता है।
ग़ौरतलब है कि इससे पहले वर्ष 2006 में भी प्राधिकरण के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी जिसका भारत में विमान सेवाओं पर ख़ासा असर पड़ा था और हज़ारों लोग प्रभावित हुए थे।
अपनी चेतावनी के अनुसार ही क़रीब 14 हज़ार हवाईअड्डा कर्मचारियों ने मंगलवार को मध्यरात्रि से ही अपनी हड़ताल शुरू कर दी है।
हालांकि हड़ताल पर अदालती रोक के मद्देनज़र कर्मचारी यूनियनों ने इसे हड़ताल के बजाय 'असहयोग' का नाम दिया है।
कर्मचारी बंगलौर और हैदराबाद के हवाईअड्डों को निजी हवाईअड्डों के कामकाज लायक होने के बाद बंद किए जाने के फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं और इसे वापस लेने की माँग कर रहे हैं।
पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने कर्मचारियों की ओर से की जा रही इस माँग को मानने से इनकार कर दिया है। उधर हड़ताल के मद्देनज़र ज़रूरी सेवाओं संबंधी क़ानून (ईएसएमए) लागू कर दिया गया है ताकि कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने से रोका जा सके।
देश के 127 हवाईअड्डे प्राधिकरण के अधीन हैं और कर्मचारियों की हड़ताल से इन हवाईअड्डों पर कामकाज प्रभावित हो सकता है।
हालांकि सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक तैयारी कर ली है। भारतीय वायुसेना के 479 कर्मियों को देश के 21 महत्वपूर्ण हवाईअड्डों पर तैनात कर दिया गया है।
इनमें दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता, चेन्नई और बंगलौर के हवाईअड्डे भी शामिल हैं ताकि हवाई यातायात को ठप होने से रोका जा सके और स्थितियां नियंत्रण में रहें।
इससे पहले मंगलवार की शाम भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के आलाअधिकारियों ने कर्मचारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत की ताकि हड़ताल को टाला जा सके पर यह कोशिश नाकामयाब ही रही।
निजीकरण का विरोध
नागरिक उड्डयन मंत्रालय के संयुक्त सचिव एएन श्रीवास्तव ने कहा है कि कर्मचारियों को दिल्ली हाईकोर्ट का वह फैसला ध्यान में रखना चाहिए जिसमें हड़ताल करने और धरने-प्रदर्शन पर रोक लगा रखी गई है। यूनियनें इस बात को ध्यान में रखते हुए फ़ैसला लें।
नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल
कर्मचारियों की माँग है कि सरकार निजीकरण को रोके
पर हड़ताल पर गए कर्मचारियों का कहना है कि सरकार बंगलौर और हैदराबाद के हवाईअड्डों को भविष्य में बंद करने का फ़ैसला वापस ले और निजी हवाईअड्डों को प्रभावी न बनाया जाए।
कर्मचारियों की यूनियनों के संयुक्त मोर्चे के नेता एमके घोषाल ने चिंता व्यक्त की कि अगर ऐसा होता है तो केवल कर्मचारियों को ही नहीं बल्कि प्राधिकरण को भी काफी नुकसान होगा और एक समय के बाद प्राधिकरण निस्प्रभावी हो जाएगा।
हालांकि हड़ताल शुरू होने के बाद से अभी तक कहीं से किसी कठिनाई या हवाई यातायात के प्रभावित होने की ख़बरें नहीं आई हैं पर दिन चढ़ने के बाद इसका असर बढ़ सकता है।
ग़ौरतलब है कि इससे पहले वर्ष 2006 में भी प्राधिकरण के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी जिसका भारत में विमान सेवाओं पर ख़ासा असर पड़ा था और हज़ारों लोग प्रभावित हुए थे।
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Tuesday, March 11, 2008
लाहौर में दो धमाकों में 12 मारे गए, कई घायल
पाकिस्तान के लाहौर शहर में एक बड़ा धमाका हुआ है और पुलिस के अनुसार कम से कम 12 लोगों के मारे जाने की ख़बर है।
लाहौर में ही एक और धमाका भी हुआ है लेकिन फ़िलहाल उसके बारे में विस्तृत जानकारी आ रही है।
पहला धमाका केंद्रीय पुलिस के कार्यालय की इमारत के पास हुआ है और इस घटना में अनेक लोग घायल भी हुए हैं।
इमारत में लगी आग
पाकिस्तान के सरकारी टीवी ने क्षतिग्रस्त इमारत और जलती हुई कारों की तस्वीरें दिंखाई हैं।
एक प्रत्यक्षदर्शी तारीक़ साईद ने समाचार एजेंसी रॉएटर्स को बताया, "इमारत बुरी तरह क्षतिग्रस्त है और वहाँ से आग की लपटें उठ रही हैं। इमारत से शव निकाले जा रहे हैं और मैनें पाँच शवों को देखा है।"
इमारत बुरी तरह क्षतिग्रस्त है और वहाँ से आग की लपटें उठ रही हैं। इमारत से शव निकाले जा रहे हैं और मैनें पाँच शवों को देखा है।
एक प्रत्यक्षदर्शी
ग़ौरतलब है कि पिछले हफ़्ते भी लाहौर में नौसेना के कॉलेज के पास हुए एक आत्मघाती हमले में चार लोग मारे गए थे और 14 घायल हुए थे।
महत्वपूर्ण है कि लाहौर में धमाके होना कोई आम बात नहीं है हालाँकि वहाँ इस साल जनवरी में हाई कोर्ट की इमारत के पास धमाका हुआ था जिसमें 19 लोग मारे गए थे।
लाहौर में ही एक और धमाका भी हुआ है लेकिन फ़िलहाल उसके बारे में विस्तृत जानकारी आ रही है।
पहला धमाका केंद्रीय पुलिस के कार्यालय की इमारत के पास हुआ है और इस घटना में अनेक लोग घायल भी हुए हैं।
इमारत में लगी आग
पाकिस्तान के सरकारी टीवी ने क्षतिग्रस्त इमारत और जलती हुई कारों की तस्वीरें दिंखाई हैं।
एक प्रत्यक्षदर्शी तारीक़ साईद ने समाचार एजेंसी रॉएटर्स को बताया, "इमारत बुरी तरह क्षतिग्रस्त है और वहाँ से आग की लपटें उठ रही हैं। इमारत से शव निकाले जा रहे हैं और मैनें पाँच शवों को देखा है।"
इमारत बुरी तरह क्षतिग्रस्त है और वहाँ से आग की लपटें उठ रही हैं। इमारत से शव निकाले जा रहे हैं और मैनें पाँच शवों को देखा है।
एक प्रत्यक्षदर्शी
ग़ौरतलब है कि पिछले हफ़्ते भी लाहौर में नौसेना के कॉलेज के पास हुए एक आत्मघाती हमले में चार लोग मारे गए थे और 14 घायल हुए थे।
महत्वपूर्ण है कि लाहौर में धमाके होना कोई आम बात नहीं है हालाँकि वहाँ इस साल जनवरी में हाई कोर्ट की इमारत के पास धमाका हुआ था जिसमें 19 लोग मारे गए थे।
Monday, March 10, 2008
पाकिस्तान: गठबंधन सरकार पर समझौता
पाकिस्तान में दो प्रमुख राजनीतिक दलों, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) ने गठबंधन सरकार बनाने के लिए समझौते पर दस्तख़त किए हैं।
पिछले दिनों पाकिस्तान में संपन्न हुए आम चुनावों में दोनों ही पार्टियाँ प्रमुखता के साथ उभरकर सामने आई थीं।
हालांकि दोनों में से किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था पर पीपीपी और पीएमएलएन, दोनों ही दल पहले और दूसरे स्थान पर रहने वाली पार्टियाँ बनकर उभरे थे।
इसके बाद से ही दोनों दलों के बीच सत्ता की बागडोर संभालने के लिए समझौते की कोशिशें चल रही थीं।
रविवार को दोनों दलों के नेताओं ने संयुक्त रूप से यह घोषणा कर दी है कि उनके बीच सरकार के गठन को लेकर एक सहमति बन गई है।
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष आसिफ़ अली ज़रदारी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के अध्यक्ष नवाज़ शरीफ़ ने बातचीत के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में इसकी घोषणा की।
संवददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि सत्ता संभालने के बाद इमरजेंसी के समय बर्ख़ास्त जजों को बहाल किया जाएगा।
दोनों नेता इस बात पर सहमत थे कि संसद का सत्र बुलाए जाने के बाद के एक महीने के अंदर बर्ख़ास्त जजों को बहाल किया जाएगा।
संयुक्त घोषणापत्र
नवाज़ शरीफ़ ने संवाददाता सम्मेलन में संयुक्त घोषणापत्र पढ़कर सुनाया। उन्होंने कहा, "पीपीपी और पीएमएल (नवाज़) लोकतांत्रिक पाकिस्तान के लिए गठबंधन बना रही हैं। 18 फरवरी के चुनाव में जनता ने भी ऐसा ही फ़ैसला दिया है।"
पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शक्तियाँ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पद पर विश्वास करती हैं और उनका कोई व्यक्तिगत एजेंडा नहीं है
आसिफ़ अली ज़रदारी
दोनों नेताओं ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से अपील की है कि वे बिना किसी देरी के संसद का सत्र बुलाए। समझौते के मुताबिक़ नया प्रधानमंत्री पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का होगा।
साथ ही नेशनल असेंबली के स्पीकर और उपाध्यक्ष का पद भी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को ही मिलेगा। समझौते के तहत पंजाब प्रांत की असेंबली में स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का पद पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) को मिलेगा।
एक सवाल के जवाब में आसिफ़ अली ज़रदारी ने कहा कि उन्हें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पद पर भरोसा है। उन्होंने कहा, "पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शक्तियाँ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पद पर विश्वास करती हैं और उनका कोई व्यक्तिगत एजेंडा नहीं है।"
शनिवार को राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने अपील की थी कि राजनीतिक पार्टियाँ राजनीति छोड़कर अच्छे प्रशासन पर ध्यान दें, ताकि देश में शांति और स्थिरता क़ायम की सके।
पिछले दिनों पाकिस्तान में संपन्न हुए आम चुनावों में दोनों ही पार्टियाँ प्रमुखता के साथ उभरकर सामने आई थीं।
हालांकि दोनों में से किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था पर पीपीपी और पीएमएलएन, दोनों ही दल पहले और दूसरे स्थान पर रहने वाली पार्टियाँ बनकर उभरे थे।
इसके बाद से ही दोनों दलों के बीच सत्ता की बागडोर संभालने के लिए समझौते की कोशिशें चल रही थीं।
रविवार को दोनों दलों के नेताओं ने संयुक्त रूप से यह घोषणा कर दी है कि उनके बीच सरकार के गठन को लेकर एक सहमति बन गई है।
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष आसिफ़ अली ज़रदारी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के अध्यक्ष नवाज़ शरीफ़ ने बातचीत के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में इसकी घोषणा की।
संवददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि सत्ता संभालने के बाद इमरजेंसी के समय बर्ख़ास्त जजों को बहाल किया जाएगा।
दोनों नेता इस बात पर सहमत थे कि संसद का सत्र बुलाए जाने के बाद के एक महीने के अंदर बर्ख़ास्त जजों को बहाल किया जाएगा।
संयुक्त घोषणापत्र
नवाज़ शरीफ़ ने संवाददाता सम्मेलन में संयुक्त घोषणापत्र पढ़कर सुनाया। उन्होंने कहा, "पीपीपी और पीएमएल (नवाज़) लोकतांत्रिक पाकिस्तान के लिए गठबंधन बना रही हैं। 18 फरवरी के चुनाव में जनता ने भी ऐसा ही फ़ैसला दिया है।"
पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शक्तियाँ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पद पर विश्वास करती हैं और उनका कोई व्यक्तिगत एजेंडा नहीं है
आसिफ़ अली ज़रदारी
दोनों नेताओं ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से अपील की है कि वे बिना किसी देरी के संसद का सत्र बुलाए। समझौते के मुताबिक़ नया प्रधानमंत्री पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का होगा।
साथ ही नेशनल असेंबली के स्पीकर और उपाध्यक्ष का पद भी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को ही मिलेगा। समझौते के तहत पंजाब प्रांत की असेंबली में स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का पद पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) को मिलेगा।
एक सवाल के जवाब में आसिफ़ अली ज़रदारी ने कहा कि उन्हें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पद पर भरोसा है। उन्होंने कहा, "पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शक्तियाँ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पद पर विश्वास करती हैं और उनका कोई व्यक्तिगत एजेंडा नहीं है।"
शनिवार को राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने अपील की थी कि राजनीतिक पार्टियाँ राजनीति छोड़कर अच्छे प्रशासन पर ध्यान दें, ताकि देश में शांति और स्थिरता क़ायम की सके।
Saturday, March 8, 2008
प्रवासी भारतीयों से वोट देने की अपील
मलेशिया में प्रवासी भारतीयों और बहुसंख्यक मलाया समुदाय के बीच छिटपुट हिंसा के बाद नई सरकार के गठन के लिए वोट डाले जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री अब्दुल्ला बदवई ने चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में टेलीविज़न के ज़रिए मलेशिया के सभी अल्पसंख्यकों से सत्तारूढ़ नेशनल फ़्रंट गठबंधन को वोट देने की अपील की।
मलेशिया में बहुसंख्यक मलय मुसलमानों के अलावा 35 फ़ीसदी आबादी अल्पसंख्यकों की है जिनमें चीन और भारतीय मूल के लोगों की संख्या काफी अधिक है।
संभावना जताई जा रही है कि इन चुनावों में सत्तारूढ़ गठबंधन ही जीत हासिल करेगी। हालाँकि पहले के मुक़ाबले उसकी सीटें कम हो सकती है।
हाल के दिनों में क़ानून का उल्लंघन करते हुए भारतीय समुदाय के लोगों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया था और स्थानीय लोगों के साथ झड़पें भी हुईं।
प्रवासी भारतीयों के संगठन हिंड्राफ़ का कहना है कि मलेशिया में रह रहे भारतीयों के साथ सरकार भेद-भाव कर रही है।
अब्दुल्ला बदवई ने अल्पसंख्यकों से अपील की, "मैं नहीं चाहता कि ऐसी सरकार का गठन हो जिसमें किसी एक नस्ल या धर्म के लोग हों।"
इस चुनाव में जातीय तनाव और बढ़ती महँगाई बड़े मुद्दे हैं। पूर्व उप प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम की अगुआई वाली विपक्षी पार्टी इन मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है।
प्रधानमंत्री अब्दुल्ला बदवई ने चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में टेलीविज़न के ज़रिए मलेशिया के सभी अल्पसंख्यकों से सत्तारूढ़ नेशनल फ़्रंट गठबंधन को वोट देने की अपील की।
मलेशिया में बहुसंख्यक मलय मुसलमानों के अलावा 35 फ़ीसदी आबादी अल्पसंख्यकों की है जिनमें चीन और भारतीय मूल के लोगों की संख्या काफी अधिक है।
संभावना जताई जा रही है कि इन चुनावों में सत्तारूढ़ गठबंधन ही जीत हासिल करेगी। हालाँकि पहले के मुक़ाबले उसकी सीटें कम हो सकती है।
हाल के दिनों में क़ानून का उल्लंघन करते हुए भारतीय समुदाय के लोगों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया था और स्थानीय लोगों के साथ झड़पें भी हुईं।
प्रवासी भारतीयों के संगठन हिंड्राफ़ का कहना है कि मलेशिया में रह रहे भारतीयों के साथ सरकार भेद-भाव कर रही है।
अब्दुल्ला बदवई ने अल्पसंख्यकों से अपील की, "मैं नहीं चाहता कि ऐसी सरकार का गठन हो जिसमें किसी एक नस्ल या धर्म के लोग हों।"
इस चुनाव में जातीय तनाव और बढ़ती महँगाई बड़े मुद्दे हैं। पूर्व उप प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम की अगुआई वाली विपक्षी पार्टी इन मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है।
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वोट
Friday, March 7, 2008
इसराइली स्कूल में आठ लोगों की हत्या
एक फ़लस्तीनी बंदूकधारी ने पश्चिमी यरुशलम स्थित एक यहूदी धार्मिक स्कूल में घुसकर कम से कम से आठ लोगों की हत्या कर दी है।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि एक बंदूकधारी रात के खाने के वक्त डाइनिंग हॉल में घुसा और उसने गोलीबारी शुरू कर दी।
उस समय वहाँ खासी भीड़भाड़ थी और लगभग 80 लोग जमा थे।
इस गोलीबारी में कम से कम 30 लोग घायल भी हुए हैं। ख़बरों के अनुसार गोली चलानेवाले को सुरक्षाबलों ने मार दिया है।
ये स्कूल यहूदी धार्मिक अध्ययन के लिए जाना जाता है और यहाँ 18 से 30 साल की उम्र के छात्र अध्ययन करते हैं।
हमले के बाद इसराइली सरकार पर जनता का जवाबी कार्रवाई के लिए भारी दबाव है। लेकिन वह कब और कैसे कार्रवाई करेगा, इसका अंदाज़ नहीं है।
घातक हमला
पिछले कुछ वर्षों में इसराइल पर ये सबसे गंभीर हमला माना जा रहा है। यरुशलम पर सन् 2007 से कोई हमला नहीं हुआ था।
धार्मिक स्कूल पर हमला
पिछले कुछ वर्षों में इसराइल पर ये सबसे गंभीर हमला माना जा रहा है
इस हमले की ख़बर के बाद ग़ज़ा में हवाई फ़ायर कर खुशी मनाई गई।
लेबनान के हिज़बुल्ला नियंत्रित टीवी चैनल ने ख़बर दी है कि इस गोलीबारी के पीछे 'जलील फ्रीडम बटालियंस' नामक संगठन है।
इधर फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास ने इस हमले की प्रशंसा की है लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ली है।
हमास का कहना था कि ग़ज़ा पर इसराइली हमले के विरोध में ये फ़लस्तीनियों की चेतावनी है।
दूसरी ओर फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इस हमले की निंदा की है।
उल्लेखनीय है कि जनवरी के बाद से इसराइल ने ग़ज़ा की घेराबंदी और बढ़ा दी है।
पिछले हफ़्ते इसराइली फ़ौज ने उत्तरी ग़ज़ा पर हमला किया था जिसमें कम से कम 120 लोगों की जानें गई थीं। हताहत होने वालों में कई नागरिक भी थे।
दूसरी ओर फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने इसराइल पर रॉकेट हमले जारी रखे हैं। पिछले हफ़्ते दक्षिणी इसराइल के भीतर कर रॉकेट हमले किए गए।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि एक बंदूकधारी रात के खाने के वक्त डाइनिंग हॉल में घुसा और उसने गोलीबारी शुरू कर दी।
उस समय वहाँ खासी भीड़भाड़ थी और लगभग 80 लोग जमा थे।
इस गोलीबारी में कम से कम 30 लोग घायल भी हुए हैं। ख़बरों के अनुसार गोली चलानेवाले को सुरक्षाबलों ने मार दिया है।
ये स्कूल यहूदी धार्मिक अध्ययन के लिए जाना जाता है और यहाँ 18 से 30 साल की उम्र के छात्र अध्ययन करते हैं।
हमले के बाद इसराइली सरकार पर जनता का जवाबी कार्रवाई के लिए भारी दबाव है। लेकिन वह कब और कैसे कार्रवाई करेगा, इसका अंदाज़ नहीं है।
घातक हमला
पिछले कुछ वर्षों में इसराइल पर ये सबसे गंभीर हमला माना जा रहा है। यरुशलम पर सन् 2007 से कोई हमला नहीं हुआ था।
धार्मिक स्कूल पर हमला
पिछले कुछ वर्षों में इसराइल पर ये सबसे गंभीर हमला माना जा रहा है
इस हमले की ख़बर के बाद ग़ज़ा में हवाई फ़ायर कर खुशी मनाई गई।
लेबनान के हिज़बुल्ला नियंत्रित टीवी चैनल ने ख़बर दी है कि इस गोलीबारी के पीछे 'जलील फ्रीडम बटालियंस' नामक संगठन है।
इधर फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास ने इस हमले की प्रशंसा की है लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ली है।
हमास का कहना था कि ग़ज़ा पर इसराइली हमले के विरोध में ये फ़लस्तीनियों की चेतावनी है।
दूसरी ओर फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इस हमले की निंदा की है।
उल्लेखनीय है कि जनवरी के बाद से इसराइल ने ग़ज़ा की घेराबंदी और बढ़ा दी है।
पिछले हफ़्ते इसराइली फ़ौज ने उत्तरी ग़ज़ा पर हमला किया था जिसमें कम से कम 120 लोगों की जानें गई थीं। हताहत होने वालों में कई नागरिक भी थे।
दूसरी ओर फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने इसराइल पर रॉकेट हमले जारी रखे हैं। पिछले हफ़्ते दक्षिणी इसराइल के भीतर कर रॉकेट हमले किए गए।
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Thursday, March 6, 2008
'गज़ा में मानवीय परिस्थितियाँ बदतर'
ब्रिटेन की सहायता एजेंसियों का कहना है कि गज़ा में 1967 में इसराइली कब्ज़े के बाद से अब तक की सबसे ख़राब मानवीय परिस्थितियाँ हैं।
ब्रिटेन की इन एजेंसियों ने वहाँ रह रहे 15 लाख फ़लस्तिनियों के अनुभवों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की है।
इस एजेंसियों में एमनेस्टी इंटरनेशनल, सेव द चिल्ड्रन, ऑक्सफ़ैम और क्रिस्चन एड शामिल हैं।
सहायता एजेंसियों ने कहा है कि इसराइल ने गज़ा पर जो प्रतिबंध लगा रखे हैं वह अवैधानिक सामूहिक सज़ा है जो सुरक्षा भी प्रदान नहीं कर पा रही है।
दूसरी ओर इसराइल का कहना है कि उसकी सैन्य कार्रवाई और दूसरे क़दम क़ानूनी और जायज़ हैं और इसराइल पर रॉकेट हमले रोकने के लिए ज़रुरी भी हैं।
त्रासदी
इसराइल ने गज़ा पर लगाए गए प्रतिबंधों को और सख़्त कर दिया था जब पिछले साल जून में हमास गुट ने इलाक़े पर कब्ज़ा कर लिया था।
गज़ा के नागरिकों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखकर उन्हें सज़ा देने को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता
केट एलन, एमनेस्टी, यूके
संयुक्त राष्ट्र कई बार चेतावनी दी है कि इसराइल ने जो घेरेबंदी कर रखी है उसके चलते गज़ा में आवश्यक सेवाएँ भी ध्वस्त होने की कगार पर हैं।
अब ब्रितानी सहायता एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में गज़ा की मानवीय परिस्थितियों का ज़िक्र करते हुए यूरोपीय संघ से अनुरोध किया है कि वे हमास गुट से चर्चा करें।
गज़ा के लोग खाद्य सहायता पर निर्भर करते हैं। एक लाख दस हज़ार लोग जो निजी क्षेत्रों में नौकरी कर रहे थे, उनमें से 75 हज़ार अपनी नौकरियाँ गँवा चुके हैं।
केयर इंटरनेशनल, यूके के ज्योफ़्री डेनिस का कहना है, "अब अगर घेरेबंदी ख़त्म नहीं हुई तो गज़ा को इस त्रासदी से वापस निकालना संभव नहीं होगा और वहाँ शांति की संभावना ख़त्म हो जाएगी।"
जनवरी के बाद से इसराइल ने गज़ा की घेरेबंदी और बढ़ा दी है।
पिछले हफ़्ते इसराइली फ़ौज ने उत्तरी गज़ा पर हमला किया था जिसमें कम से कम 120 लोगों की जानें गई थीं। हताहत होने वालों में कई नागरिक भी थे।
दूसरी ओर फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने इसराइल पर रॉकेट हमले जारी रखे हैं। पिछले हफ़्ते दक्षिणी इसराइल के भीतर कर रॉकेट हमले किए गए।
गज़ा में इसराइली टैंक
गज़ा पर इसराइल ने पिछले हफ़्ते ही एक बड़ा हमला किया था
ब्रितानी एजेंसियों का कहना है कि इसराइल को यह अधिकार तो है कि वह अपने नागरिकों की रक्षा करे।
एजेंसियों ने दोनों ही पक्षों में अपील की है कि वे नागरिकों पर अवैधानिक हमले रोकें।
उन्होंने इसराइल से कहा है कि गज़ा के लोगों को भोजन, पीने का साफ़ पानी, बिजली और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाने की अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करे।
एमनेस्टी, यूके के निदेशक केट एलन का कहना है, "गज़ा के नागरिकों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखकर उन्हें सज़ा देने को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।"
उनका कहना है, "यह त्रासदी मानव निर्मित है और इसे बदलना चाहिए।"
एजेंसियों ने हमास और फ़तह दोनों ही गुटों से अपील की है कि वे इस त्रासदी को ख़त्म करने के लिए क़दम उठाएँ।
हमास गुट का गज़ा पर कब्ज़ा है और वह इसराइल को मान्यता देने से इनकार करता है। जबकि फ़तह गुट ने महमूद अब्बास के नेतृत्व में पश्चिमी तट पर नियंत्रण संभाल रखा है।
क्रिस्चन एड के दलीप मुखर्जी का कहना है, "गज़ा में तब तक शांति स्थापना नहीं हो सकती जब तक इसराइल, फ़तह और चौगुट (अमरीका, संयुक्त राष्ट्र, यूरोप और रूस) मिलकर हमास से बात न करें और गज़ा के लोगों के भविष्य के प्रति आश्वस्त करें।"
लेकिन अपीलें काम नहीं आ रहीं हैं क्योंकि इस बीच इसराइली मंत्रिमंडल ने गज़ा की घेरेबंदी जारी रखने की अनुशंसा की है।
ब्रिटेन की इन एजेंसियों ने वहाँ रह रहे 15 लाख फ़लस्तिनियों के अनुभवों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की है।
इस एजेंसियों में एमनेस्टी इंटरनेशनल, सेव द चिल्ड्रन, ऑक्सफ़ैम और क्रिस्चन एड शामिल हैं।
सहायता एजेंसियों ने कहा है कि इसराइल ने गज़ा पर जो प्रतिबंध लगा रखे हैं वह अवैधानिक सामूहिक सज़ा है जो सुरक्षा भी प्रदान नहीं कर पा रही है।
दूसरी ओर इसराइल का कहना है कि उसकी सैन्य कार्रवाई और दूसरे क़दम क़ानूनी और जायज़ हैं और इसराइल पर रॉकेट हमले रोकने के लिए ज़रुरी भी हैं।
त्रासदी
इसराइल ने गज़ा पर लगाए गए प्रतिबंधों को और सख़्त कर दिया था जब पिछले साल जून में हमास गुट ने इलाक़े पर कब्ज़ा कर लिया था।
गज़ा के नागरिकों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखकर उन्हें सज़ा देने को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता
केट एलन, एमनेस्टी, यूके
संयुक्त राष्ट्र कई बार चेतावनी दी है कि इसराइल ने जो घेरेबंदी कर रखी है उसके चलते गज़ा में आवश्यक सेवाएँ भी ध्वस्त होने की कगार पर हैं।
अब ब्रितानी सहायता एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में गज़ा की मानवीय परिस्थितियों का ज़िक्र करते हुए यूरोपीय संघ से अनुरोध किया है कि वे हमास गुट से चर्चा करें।
गज़ा के लोग खाद्य सहायता पर निर्भर करते हैं। एक लाख दस हज़ार लोग जो निजी क्षेत्रों में नौकरी कर रहे थे, उनमें से 75 हज़ार अपनी नौकरियाँ गँवा चुके हैं।
केयर इंटरनेशनल, यूके के ज्योफ़्री डेनिस का कहना है, "अब अगर घेरेबंदी ख़त्म नहीं हुई तो गज़ा को इस त्रासदी से वापस निकालना संभव नहीं होगा और वहाँ शांति की संभावना ख़त्म हो जाएगी।"
जनवरी के बाद से इसराइल ने गज़ा की घेरेबंदी और बढ़ा दी है।
पिछले हफ़्ते इसराइली फ़ौज ने उत्तरी गज़ा पर हमला किया था जिसमें कम से कम 120 लोगों की जानें गई थीं। हताहत होने वालों में कई नागरिक भी थे।
दूसरी ओर फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने इसराइल पर रॉकेट हमले जारी रखे हैं। पिछले हफ़्ते दक्षिणी इसराइल के भीतर कर रॉकेट हमले किए गए।
गज़ा में इसराइली टैंक
गज़ा पर इसराइल ने पिछले हफ़्ते ही एक बड़ा हमला किया था
ब्रितानी एजेंसियों का कहना है कि इसराइल को यह अधिकार तो है कि वह अपने नागरिकों की रक्षा करे।
एजेंसियों ने दोनों ही पक्षों में अपील की है कि वे नागरिकों पर अवैधानिक हमले रोकें।
उन्होंने इसराइल से कहा है कि गज़ा के लोगों को भोजन, पीने का साफ़ पानी, बिजली और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाने की अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करे।
एमनेस्टी, यूके के निदेशक केट एलन का कहना है, "गज़ा के नागरिकों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखकर उन्हें सज़ा देने को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।"
उनका कहना है, "यह त्रासदी मानव निर्मित है और इसे बदलना चाहिए।"
एजेंसियों ने हमास और फ़तह दोनों ही गुटों से अपील की है कि वे इस त्रासदी को ख़त्म करने के लिए क़दम उठाएँ।
हमास गुट का गज़ा पर कब्ज़ा है और वह इसराइल को मान्यता देने से इनकार करता है। जबकि फ़तह गुट ने महमूद अब्बास के नेतृत्व में पश्चिमी तट पर नियंत्रण संभाल रखा है।
क्रिस्चन एड के दलीप मुखर्जी का कहना है, "गज़ा में तब तक शांति स्थापना नहीं हो सकती जब तक इसराइल, फ़तह और चौगुट (अमरीका, संयुक्त राष्ट्र, यूरोप और रूस) मिलकर हमास से बात न करें और गज़ा के लोगों के भविष्य के प्रति आश्वस्त करें।"
लेकिन अपीलें काम नहीं आ रहीं हैं क्योंकि इस बीच इसराइली मंत्रिमंडल ने गज़ा की घेरेबंदी जारी रखने की अनुशंसा की है।
Wednesday, March 5, 2008
मैक्केन ने जीती रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी
अमरीका में नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए जॉन मैक्केन रिपब्लिकन पार्टी की ओर से अधिकृत उम्मीदवार चुन लिए गए हैं।
चार राज्यों में हुए चुनाव में भारी जीत के बाद उनके प्रतिद्वंद्वी माइक हकबी मैदान से हट गए हैं और उन्होंने जॉन मैक्केन को फ़ोन पर बधाई दी है।
उधर डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों में अभी भी टक्कर चल रही है।
अमरीकी मीडिया का कहना है कि ओहायो राज्य का अहम चुनाव हिलेरी क्लिंटन ने जीत लिया है जबकि टेक्सस में काँटे की टक्कर बताई जा रही है।
इससे पहले वेरमोंट प्रांत में वेरमोंट प्रांत में डेमोक्रेट उम्मीदवार बराक ओबामा ने जीत दर्ज की थी और हिलेरी क्लिंटन ने रोड आइलैंड में जीत हासिल कर ली थी।
कहा जा रहा था कि यह अंतिम मुक़ाबला होगा जिसमें बराक ओबामा हिलेरी क्लिंटन को बाहर कर देंगे।
लेकिन हिलेरी क्लिंटन ने घोषणा कर दी है कि चाहे चुनाव परिणाम जो हों वे अंत तक दौड़ से हटने वाली नहीं हैं।
मैक्केन की जीत
चारों राज्यों में जॉन मैक्केन को मिली जीत से उन्हें 1,191 प्रतिनिधियों से अधिक का समर्थन मिल गया है। सितंबर में होने वाले पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में पार्टी के औपचारिक उम्मीदवार चुने जाने के लिए कम से कम इतने प्रतिनिधियों का समर्थन हासिल करना ज़रुरी था।
डलास, टेक्सस में अपने समर्थकों से बात करते हुए मैक्केन ने कहा कि डेमोक्रेट उम्मीदवार के सामने उन्हें चुनने के लिए वे अमरीकी जनता का सम्मान करने वाली और उन्हें सहमत करने वाली ठोस बातें रखेंगे।
मैक्केन ने अपने भाषण में उन सभी चुनौतियों का ज़िक्र किया जो अमरीका के सामने हैं, जिनमें इराक़ युद्ध के अलावा अलक़ायदा और तालेबान से लड़ाई भी शामिल है।
उन्होंने एक ऐसे चुनाव प्रचार की बात कही जिसमें झूठे वादे न किए जाएँ। उन्होंने अमरीकी जनता से अपील की है कि वे अमरीका की ताक़त, उसके आदर्शों और उसके भविष्य के लिए लड़ने के लिए सामने आएँ।
इसके बाद वे बुधवार को व्हाइट हाउस जाकर राष्ट्रपति बुश से अपनी उम्मीदवारी के लिए औपचारिक समर्थन हासिल करेंगे।
ओबामा-हिलेरी में टक्कर
डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से उम्मीदवारी की दावेदार हिलेरी क्लिंटन कहती रही हैं कि यदि आप ओहायो राज्य का चुनाव नहीं जीत सकते तो आप डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नहीं हो सकते।
ओबामा और हिलेरी
डेमोक्रेट उम्मीदवारों के बीच शुरु से ही टक्कर चल रही है
और अब उन्होंने ओहायो राज्य का चुनाव जीत लिया है।
हालांकि टेक्सस के परिणामों के बारे में कहा जा रहा है कि वहाँ अभी भी कांटे की टक्कर है।
वेरमोंट में ओबामा ने जीत हासिल की है तो रोड आइलैंड में हिलेरी ने जीत दर्ज की है।
बराक ओबामा ने चार फ़रवरी को हुए सुपर ट्यूसडे चुनाव से चार मार्च के चुनावों के बीच लगातार 11 राज्यों में जीत हासिल की है और वे हिलेरी क्लिंटन से आगे निकल गए हैं।
इन चार राज्यों के चुनाव के लिए बराक ओबामा ने चुनाव प्रचार पर हिलेरी क्लिंटन की तुलना में दोगुना खर्च किया है।
डेमोक्रेट पार्टी की उम्मीदवारी जीतने के लिए कुल 2, 025 प्रतिनिधियों का समर्थन हासिल करना ज़रूरी होगा।
चार राज्यों में हुए चुनाव में भारी जीत के बाद उनके प्रतिद्वंद्वी माइक हकबी मैदान से हट गए हैं और उन्होंने जॉन मैक्केन को फ़ोन पर बधाई दी है।
उधर डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों में अभी भी टक्कर चल रही है।
अमरीकी मीडिया का कहना है कि ओहायो राज्य का अहम चुनाव हिलेरी क्लिंटन ने जीत लिया है जबकि टेक्सस में काँटे की टक्कर बताई जा रही है।
इससे पहले वेरमोंट प्रांत में वेरमोंट प्रांत में डेमोक्रेट उम्मीदवार बराक ओबामा ने जीत दर्ज की थी और हिलेरी क्लिंटन ने रोड आइलैंड में जीत हासिल कर ली थी।
कहा जा रहा था कि यह अंतिम मुक़ाबला होगा जिसमें बराक ओबामा हिलेरी क्लिंटन को बाहर कर देंगे।
लेकिन हिलेरी क्लिंटन ने घोषणा कर दी है कि चाहे चुनाव परिणाम जो हों वे अंत तक दौड़ से हटने वाली नहीं हैं।
मैक्केन की जीत
चारों राज्यों में जॉन मैक्केन को मिली जीत से उन्हें 1,191 प्रतिनिधियों से अधिक का समर्थन मिल गया है। सितंबर में होने वाले पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में पार्टी के औपचारिक उम्मीदवार चुने जाने के लिए कम से कम इतने प्रतिनिधियों का समर्थन हासिल करना ज़रुरी था।
डलास, टेक्सस में अपने समर्थकों से बात करते हुए मैक्केन ने कहा कि डेमोक्रेट उम्मीदवार के सामने उन्हें चुनने के लिए वे अमरीकी जनता का सम्मान करने वाली और उन्हें सहमत करने वाली ठोस बातें रखेंगे।
मैक्केन ने अपने भाषण में उन सभी चुनौतियों का ज़िक्र किया जो अमरीका के सामने हैं, जिनमें इराक़ युद्ध के अलावा अलक़ायदा और तालेबान से लड़ाई भी शामिल है।
उन्होंने एक ऐसे चुनाव प्रचार की बात कही जिसमें झूठे वादे न किए जाएँ। उन्होंने अमरीकी जनता से अपील की है कि वे अमरीका की ताक़त, उसके आदर्शों और उसके भविष्य के लिए लड़ने के लिए सामने आएँ।
इसके बाद वे बुधवार को व्हाइट हाउस जाकर राष्ट्रपति बुश से अपनी उम्मीदवारी के लिए औपचारिक समर्थन हासिल करेंगे।
ओबामा-हिलेरी में टक्कर
डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से उम्मीदवारी की दावेदार हिलेरी क्लिंटन कहती रही हैं कि यदि आप ओहायो राज्य का चुनाव नहीं जीत सकते तो आप डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नहीं हो सकते।
ओबामा और हिलेरी
डेमोक्रेट उम्मीदवारों के बीच शुरु से ही टक्कर चल रही है
और अब उन्होंने ओहायो राज्य का चुनाव जीत लिया है।
हालांकि टेक्सस के परिणामों के बारे में कहा जा रहा है कि वहाँ अभी भी कांटे की टक्कर है।
वेरमोंट में ओबामा ने जीत हासिल की है तो रोड आइलैंड में हिलेरी ने जीत दर्ज की है।
बराक ओबामा ने चार फ़रवरी को हुए सुपर ट्यूसडे चुनाव से चार मार्च के चुनावों के बीच लगातार 11 राज्यों में जीत हासिल की है और वे हिलेरी क्लिंटन से आगे निकल गए हैं।
इन चार राज्यों के चुनाव के लिए बराक ओबामा ने चुनाव प्रचार पर हिलेरी क्लिंटन की तुलना में दोगुना खर्च किया है।
डेमोक्रेट पार्टी की उम्मीदवारी जीतने के लिए कुल 2, 025 प्रतिनिधियों का समर्थन हासिल करना ज़रूरी होगा।
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रिपब्लिकन पार्टी
Tuesday, March 4, 2008
आशा हो, तभी ज़िदा रह सकते हैं: कश्मीर सिंह
पाकिस्तान में क़रीब 35 वर्षों तक जेल में बंद रहने के बाद रिहा हुए भारतीय क़ैदी कश्मीर सिंह का कहना है कि 'इंसान को आशा होता है तभी वह जिंदा रहता है।'
किसी समय अमृतसर पुलिस में रहे कश्मीर सिंह को 35 साल पहले पाकिस्तान में रावलपिंडी में जासूसी के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था और उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई थी।
सोमवार को लाहौर में रिहाई के बाद जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें कोई आशा थी कि वे कभी रिहा होंगे तो उन्होंने बताया, "इंसान को आशा होती है तभी वह ज़िंदा रहता है। कोई न कोई आशा तो लगा ही रखी होती है नहीं तो समय से पहले ही मौत हो जाए।"
उधर उनकी पत्नी परमजीत कौर कुछ दिन पहले कह रही थीं कि रिहाई की कोई पुख़्ता ख़बर आए तब ही उन्हें संतोष होगा। मंगलवार को रिहाई की ख़बर सुनने के बाद उनका कहना था, "मैं ख़ुश हूँ कि वे आज़ाद हो गए हैं।"
साठ वर्षीय कश्मीर सिंह मंगलवार को वाघा-अटारी भारत-पाकिस्तान सीमा के ज़रिए सड़क से होते हुए भारत में पहुँचेंगे। वहाँ उनकी पत्नी परमजीत कौर और दो में से उनके एक पुत्र, उनके गाँववासियों के साथ उनका स्वागत करने के लिए सोमवार से ही मौजूद हैं।
एक मंत्री और एक पत्रकार की भूमिका
इंसान को आशा होती है तभी वह ज़िंदा रहता है। कोई न कोई आशा तो लगा ही रखी होती है नहीं तो समय से पहले ही मौत न हो जाए
रिहाई के बाद कश्मीर सिंह
कश्मीर सिंह लाहौर जेल में बंद थे। कोट लखपत जेल के अधीक्षक जावेद लतीफ़ ने बताया कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के आदेश के बाद कश्मीर सिंह को रिहा किया गया।
पाकिस्तान की कार्यवाहक सरकार में मानवाधिकार मामलों के मंत्री अंसार बर्नी ने कश्मीर सिंह का मामला हाथ में लिया और उनकी खोज शुरु कर दी।
लेकिन उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा क्योंकि इतने साल पाकिस्तान जेल में रहते हुए कश्मीर सिंह को इब्राहीम के नाम से जाना जाने लगा था।
उधर भारत में कश्मीर सिंह के परिवार के सदस्यों की बात वरिष्ठ पत्रकार जीसी भारद्वाज ने सामने रखी। उन्होंने भारत सरकार के साथ-साथ पाकिस्तानी प्रशासन और अंसार बर्नी से भी संपर्क कायम किया।
कश्मीर सिंह होशियारपुर के नंगलखिलाड़ियाँ गाँव के रहने वाले हैं। संयोग से भारद्वाज का पैतृक गाँव भी नंगलखिलाड़ियाँ है और उन्होंने पिछले दो साल में कश्मीर सिंह की पत्नी परमजीत कौर और उनके दौ बेटों की गुहार सरकार तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई है।
अंसार बर्नी को सबसे पहले रेडियो पर प्रसारित एक टॉक शो से कश्मीर सिंह के बारे में पता चला।
परमजीत नेबताया कि उन्होंने बहुत मुश्किलों के साथ अपने बेटों को पाला
उन्होंने मामला राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के समक्ष रखा और उनकी अपील स्वीकार हो गई और कश्मीर सिंह की रिहाई का आदेश दिया गया।
'बच्चों की बहुत याद आई'
कश्मीर सिंह ने रिहा होने के बाद बातचीत में कहा, "मैं बेहतर महसूस कर रहा हूँ। मैं ख़ुश हूँ।"
उनका कहना था कि जेल में उन्हें बच्चों की बहुत याद आई। उनका कहना था कि जब वे गिरफ़्तार हुए थे तो उनके बच्चे बहुत छोटे थे इसलिए वे उन्हें पहचान नहीं पाएँगे, केवल अपनी पत्नी को ही पहचान पाए पाएँगे।
सोमवार को उन्होंने अपनी पत्नी परमजीत कौर से फ़ोन पर बातचीत भी की और उनकी सेहत के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "मेरी सेहत अच्छी है। मैं ख़ुश हूँ। कल पहुँच जाऊँगा।"
उन्होंने रिहाई के बात पत्रकारों के पूछने पर अपनी 'लव मैरेज' का ज़िक्र करते हुए कहा, "मैनें अपनी मर्ज़ी से, प्यार की शादी की थी।" इस बारे में उनकी पत्नी परमजीत कौर का कहना था कि इसीलिए तो उन्होंने इतने साल कश्मीर सिंह का इंतज़ार किया।
रिहाई से पहले परमजीत ने बताया था कि उन्होंने अपने पति की ग़ैरमौजूदगी में बहुत मुश्किलों का सामना किया और छोट-छोटे काम कर अपने दो बेटों को पाल कर बड़ा किया। उनका एक बेट पंजाब में रहता है जबकि दूसरा बेटा विदेश में काम करता है।
किसी समय अमृतसर पुलिस में रहे कश्मीर सिंह को 35 साल पहले पाकिस्तान में रावलपिंडी में जासूसी के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था और उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई थी।
सोमवार को लाहौर में रिहाई के बाद जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें कोई आशा थी कि वे कभी रिहा होंगे तो उन्होंने बताया, "इंसान को आशा होती है तभी वह ज़िंदा रहता है। कोई न कोई आशा तो लगा ही रखी होती है नहीं तो समय से पहले ही मौत हो जाए।"
उधर उनकी पत्नी परमजीत कौर कुछ दिन पहले कह रही थीं कि रिहाई की कोई पुख़्ता ख़बर आए तब ही उन्हें संतोष होगा। मंगलवार को रिहाई की ख़बर सुनने के बाद उनका कहना था, "मैं ख़ुश हूँ कि वे आज़ाद हो गए हैं।"
साठ वर्षीय कश्मीर सिंह मंगलवार को वाघा-अटारी भारत-पाकिस्तान सीमा के ज़रिए सड़क से होते हुए भारत में पहुँचेंगे। वहाँ उनकी पत्नी परमजीत कौर और दो में से उनके एक पुत्र, उनके गाँववासियों के साथ उनका स्वागत करने के लिए सोमवार से ही मौजूद हैं।
एक मंत्री और एक पत्रकार की भूमिका
इंसान को आशा होती है तभी वह ज़िंदा रहता है। कोई न कोई आशा तो लगा ही रखी होती है नहीं तो समय से पहले ही मौत न हो जाए
रिहाई के बाद कश्मीर सिंह
कश्मीर सिंह लाहौर जेल में बंद थे। कोट लखपत जेल के अधीक्षक जावेद लतीफ़ ने बताया कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के आदेश के बाद कश्मीर सिंह को रिहा किया गया।
पाकिस्तान की कार्यवाहक सरकार में मानवाधिकार मामलों के मंत्री अंसार बर्नी ने कश्मीर सिंह का मामला हाथ में लिया और उनकी खोज शुरु कर दी।
लेकिन उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा क्योंकि इतने साल पाकिस्तान जेल में रहते हुए कश्मीर सिंह को इब्राहीम के नाम से जाना जाने लगा था।
उधर भारत में कश्मीर सिंह के परिवार के सदस्यों की बात वरिष्ठ पत्रकार जीसी भारद्वाज ने सामने रखी। उन्होंने भारत सरकार के साथ-साथ पाकिस्तानी प्रशासन और अंसार बर्नी से भी संपर्क कायम किया।
कश्मीर सिंह होशियारपुर के नंगलखिलाड़ियाँ गाँव के रहने वाले हैं। संयोग से भारद्वाज का पैतृक गाँव भी नंगलखिलाड़ियाँ है और उन्होंने पिछले दो साल में कश्मीर सिंह की पत्नी परमजीत कौर और उनके दौ बेटों की गुहार सरकार तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई है।
अंसार बर्नी को सबसे पहले रेडियो पर प्रसारित एक टॉक शो से कश्मीर सिंह के बारे में पता चला।
परमजीत नेबताया कि उन्होंने बहुत मुश्किलों के साथ अपने बेटों को पाला
उन्होंने मामला राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के समक्ष रखा और उनकी अपील स्वीकार हो गई और कश्मीर सिंह की रिहाई का आदेश दिया गया।
'बच्चों की बहुत याद आई'
कश्मीर सिंह ने रिहा होने के बाद बातचीत में कहा, "मैं बेहतर महसूस कर रहा हूँ। मैं ख़ुश हूँ।"
उनका कहना था कि जेल में उन्हें बच्चों की बहुत याद आई। उनका कहना था कि जब वे गिरफ़्तार हुए थे तो उनके बच्चे बहुत छोटे थे इसलिए वे उन्हें पहचान नहीं पाएँगे, केवल अपनी पत्नी को ही पहचान पाए पाएँगे।
सोमवार को उन्होंने अपनी पत्नी परमजीत कौर से फ़ोन पर बातचीत भी की और उनकी सेहत के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "मेरी सेहत अच्छी है। मैं ख़ुश हूँ। कल पहुँच जाऊँगा।"
उन्होंने रिहाई के बात पत्रकारों के पूछने पर अपनी 'लव मैरेज' का ज़िक्र करते हुए कहा, "मैनें अपनी मर्ज़ी से, प्यार की शादी की थी।" इस बारे में उनकी पत्नी परमजीत कौर का कहना था कि इसीलिए तो उन्होंने इतने साल कश्मीर सिंह का इंतज़ार किया।
रिहाई से पहले परमजीत ने बताया था कि उन्होंने अपने पति की ग़ैरमौजूदगी में बहुत मुश्किलों का सामना किया और छोट-छोटे काम कर अपने दो बेटों को पाल कर बड़ा किया। उनका एक बेट पंजाब में रहता है जबकि दूसरा बेटा विदेश में काम करता है।
Monday, March 3, 2008
रूस में मेदवेदेव की जीत
रूस में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों में मौजूदा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समर्थित उपप्रधानमंत्री दिमित्री मेदवेदेव को जीत हासिल हुई है। रविवार को हुए मतदान में 68 प्रतिशत मतदाताओं ने भाग लिया और मेदवेदेव को उनमें से लगभग 70 प्रतिशत मत मिले।
रविवार को हुए चुनावों में लगभग 68 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट दिया था।
उनके प्रतिद्वंद्वी कम्युनिस्ट पार्टी के गेनादी ज़ुगानोव को लगभग 20 प्रतिशत मत मिले हैं। रूसी समाचार एजेंसी इतर-तास के मुताबिक ज़ुगानोव ने कहा है कि चुनाव में धाँधली हुई है और वे न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाएँगे।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने मेदवेदेव को अपने उत्तराधिकारी की तौर पर समर्थन दिया था।
'पुतिन की नीतियाँ जारी रहेंगी'
मॉस्को में राष्ट्रपति पुतिन और मेदवेदेव साथ-साथ नज़र आए। मेदवेदेव ने कहा कि वे अपनी नीतियाँ में राष्ट्रपति पुतिन के दिखाए रास्ते का अनुसरण करेंगे।
मेदवेदेव का अब तक का सफ़र....
उन्होंने कहा कि वे अपनी सरकार राष्ट्रपति पुतिन के सहयोग के बनाएँगे और उसमें पुतिन प्रधानमंत्री होंगे।
मेदवेदेव ने कहा कि जब वे राष्ट्रपति बनेंगे तो उनकी विदेश नीति सभी क़ानूनी तरीकों से रूस के हितों की रक्षा करने पर केंद्रित होगी।
मेदवेदेव
रूस के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मेदवेदेव ने कहा कि पुतिन उनकी सरकार में प्रधानमंत्री होंगे
रूस के स्वतंत्र निरीक्षक दल (गोलोस) ने देश में हुए मतदान की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि कुछ इलाक़ो में जितना ज़्यादा मतदान हुआ है वह असंभव प्रतीत होता है।
नहीं लड़ सकते थे पुतिन
मॉस्को के रेड स्क्वेयर में दोनो नेता साथ-साथ दिखाई दिए और राष्ट्रपति पुतिन ने मेदवेदेव को बधाई दी।
पुतिन पिछले आठ साल से राष्ट्रपति हैं और संविधान के अनुसार वे तीसरी बार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नहीं लड़ सकते थे।
लेकिन वे मेदवेदेव के प्रधानमंत्री बनने पर राज़ी हो गए हैं।
संवाददाताओं के मुताबिक चुनाव के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए कई तरह के प्रलोभन दिए गए जिनमें सस्ते खाद्य पदार्थ, मुफ्त सिनेमा टिकट, खिलौने इत्यादी शामिल थे।
महत्वपूर्ण है कि पश्चिमी देशों के पर्यवेक्षकों की ओर से रूस के राष्ट्रपति चुनावों का ख़ास निरीक्षण नहीं हुआ है और अनेक पर्यवेक्षक चुनावों से दूर ही रहे हैं।
रविवार को हुए चुनावों में लगभग 68 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट दिया था।
उनके प्रतिद्वंद्वी कम्युनिस्ट पार्टी के गेनादी ज़ुगानोव को लगभग 20 प्रतिशत मत मिले हैं। रूसी समाचार एजेंसी इतर-तास के मुताबिक ज़ुगानोव ने कहा है कि चुनाव में धाँधली हुई है और वे न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाएँगे।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने मेदवेदेव को अपने उत्तराधिकारी की तौर पर समर्थन दिया था।
'पुतिन की नीतियाँ जारी रहेंगी'
मॉस्को में राष्ट्रपति पुतिन और मेदवेदेव साथ-साथ नज़र आए। मेदवेदेव ने कहा कि वे अपनी नीतियाँ में राष्ट्रपति पुतिन के दिखाए रास्ते का अनुसरण करेंगे।
मेदवेदेव का अब तक का सफ़र....
उन्होंने कहा कि वे अपनी सरकार राष्ट्रपति पुतिन के सहयोग के बनाएँगे और उसमें पुतिन प्रधानमंत्री होंगे।
मेदवेदेव ने कहा कि जब वे राष्ट्रपति बनेंगे तो उनकी विदेश नीति सभी क़ानूनी तरीकों से रूस के हितों की रक्षा करने पर केंद्रित होगी।
मेदवेदेव
रूस के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मेदवेदेव ने कहा कि पुतिन उनकी सरकार में प्रधानमंत्री होंगे
रूस के स्वतंत्र निरीक्षक दल (गोलोस) ने देश में हुए मतदान की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि कुछ इलाक़ो में जितना ज़्यादा मतदान हुआ है वह असंभव प्रतीत होता है।
नहीं लड़ सकते थे पुतिन
मॉस्को के रेड स्क्वेयर में दोनो नेता साथ-साथ दिखाई दिए और राष्ट्रपति पुतिन ने मेदवेदेव को बधाई दी।
पुतिन पिछले आठ साल से राष्ट्रपति हैं और संविधान के अनुसार वे तीसरी बार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नहीं लड़ सकते थे।
लेकिन वे मेदवेदेव के प्रधानमंत्री बनने पर राज़ी हो गए हैं।
संवाददाताओं के मुताबिक चुनाव के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए कई तरह के प्रलोभन दिए गए जिनमें सस्ते खाद्य पदार्थ, मुफ्त सिनेमा टिकट, खिलौने इत्यादी शामिल थे।
महत्वपूर्ण है कि पश्चिमी देशों के पर्यवेक्षकों की ओर से रूस के राष्ट्रपति चुनावों का ख़ास निरीक्षण नहीं हुआ है और अनेक पर्यवेक्षक चुनावों से दूर ही रहे हैं।
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Saturday, March 1, 2008
भाजपा, वाम ने की बजट की आलोचना
भाजपा ने पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया है, वहीं सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले वाम दलों ने भी इसकी आलोचना की है.
भारतीय जनता पार्टी नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने मीडिया को बताया, "बजट में ऐसा कुछ भी नहीं है जो अर्थव्यवस्था की मूल समस्याओं - महँगाई, ब्याज दर और मूलभूत ढाँचे की कमी को सुलझाने का रास्ता दिखाता हो."
उनका कहना था कि बजट को लोक-लुभावन बनाने की कोशिश की गई है लेकिन देखना होगा कि आम आदमी को इससे क्या मिलेगा. उन्होंने ये भी प्रश्न उठाया कि सरकार को किसानों और अन्य वर्गों का ध्यान कार्यकाल के आख़िरी वर्ष में ही क्यों आया?
बजट में ऐसा कुछ भी नहीं है जो अर्थव्यवस्था की मूल समस्याओं - महँगाई, ब्याज दर और मूलभूत ढाँचे की कमी को सुलझाने का रास्ता दिखाता हो
यशवंत सिन्हा
किसानों के कर्ज़ माफ़ करने के बारे में उनका कहना था कि चाहे वित्त मंत्री ने इसके लिए 30 जून का समय रखा है लेकिन इसके लिए राज्यों का सहयोग चाहिए होगा और क्या ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था है कि छोटे किसानों की पहचान की जा सके?
वामदल भी नाराज़
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की वरिष्ठ नेता वृंदा कारत ने कहा कि वे वित्त मंत्री से कुछ हद तक ही सहमत हैं.
उनका कहना था, "इस बजट में किसानों के मुद्दे का समाधान करने की कोशिश की गई है लेकिन देखना है कि कितने लोगों को फ़ायदा होता है. महँगाई और बेरोज़गारी के अहम मुद्दों के बारे में बजट में कुछ नहीं सुझाया गया है."
उधर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने बजट की आलोचना करते हुए कहा है कि बजट में किसानों की समस्याओं के समाधान के बारे में कुछ नहीं है.
इस बजट में किसानों के मुद्दे का समाधान करने की कोशिश की गई है लेकिन देखना है कि कितने लोगों को फ़ायदा होता है. महँगाई और बेरोज़गारी के अहम मुद्दों के बारे में बजट में कुछ नहीं सुझाया गया है
सीपीएम की वृंदा कारत
सीपीआई ने किसानों का कर्ज़ माफ़ करने की तो सराहना की है लेकिन साथ ही कहा है कि सरकार और आगे भी बढ़ सकती थी और राष्ट्रीय ऋण राहत आयोग गठित कर सकती थी.
मीडिया से बात करते हुए सीपीआई नेता डी राजा ने कहा, "कोई नया रास्ता खोजने की जगह बजट केवल नुकसान को रोकने और पहले ही वाले आर्थिक सुधार की दिशा में बढ़ने की बात करता है."
प्रधानमंत्री ख़ुश
कोई नया रास्ता खोजने की जगह बजट केवल नुकसान को रोकने और पहले ही वाले आर्थिक सुधार की दिशा में बढ़ने की बात करता है
सीपीआई के डी राजा
उधर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बजट को 'बेहतरीन' बताया है. उनका कहना था कि बजट 'आम आदमी, मध्य वर्ग और किसानों' के लिए है.
उधर वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने संसद में अपने भाषण के बाद कहा है कि कृषि क्षेत्र बुरी स्थिति में नहीं है और उनका आकलन है कि खाद्य पदार्थों का रिकॉर्द उत्पादन होगा. उन्होंने माना कि कृषि क्षेत्र की विकास दर 2.6 प्रतिशत है जबकि सरकार का लक्ष्य इसे चार प्रतिशत तक पहुँचाना है.
वित्त मंत्री का ये भी कहना था कि किसानों का कर्ज़ माफ़ करना कृषि क्षेत्र की केवल एक समस्या को सुलझाता है लेकिन इस समस्या के और पहलु भी हैं.
भारतीय जनता पार्टी नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने मीडिया को बताया, "बजट में ऐसा कुछ भी नहीं है जो अर्थव्यवस्था की मूल समस्याओं - महँगाई, ब्याज दर और मूलभूत ढाँचे की कमी को सुलझाने का रास्ता दिखाता हो."
उनका कहना था कि बजट को लोक-लुभावन बनाने की कोशिश की गई है लेकिन देखना होगा कि आम आदमी को इससे क्या मिलेगा. उन्होंने ये भी प्रश्न उठाया कि सरकार को किसानों और अन्य वर्गों का ध्यान कार्यकाल के आख़िरी वर्ष में ही क्यों आया?
बजट में ऐसा कुछ भी नहीं है जो अर्थव्यवस्था की मूल समस्याओं - महँगाई, ब्याज दर और मूलभूत ढाँचे की कमी को सुलझाने का रास्ता दिखाता हो
यशवंत सिन्हा
किसानों के कर्ज़ माफ़ करने के बारे में उनका कहना था कि चाहे वित्त मंत्री ने इसके लिए 30 जून का समय रखा है लेकिन इसके लिए राज्यों का सहयोग चाहिए होगा और क्या ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था है कि छोटे किसानों की पहचान की जा सके?
वामदल भी नाराज़
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की वरिष्ठ नेता वृंदा कारत ने कहा कि वे वित्त मंत्री से कुछ हद तक ही सहमत हैं.
उनका कहना था, "इस बजट में किसानों के मुद्दे का समाधान करने की कोशिश की गई है लेकिन देखना है कि कितने लोगों को फ़ायदा होता है. महँगाई और बेरोज़गारी के अहम मुद्दों के बारे में बजट में कुछ नहीं सुझाया गया है."
उधर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने बजट की आलोचना करते हुए कहा है कि बजट में किसानों की समस्याओं के समाधान के बारे में कुछ नहीं है.
इस बजट में किसानों के मुद्दे का समाधान करने की कोशिश की गई है लेकिन देखना है कि कितने लोगों को फ़ायदा होता है. महँगाई और बेरोज़गारी के अहम मुद्दों के बारे में बजट में कुछ नहीं सुझाया गया है
सीपीएम की वृंदा कारत
सीपीआई ने किसानों का कर्ज़ माफ़ करने की तो सराहना की है लेकिन साथ ही कहा है कि सरकार और आगे भी बढ़ सकती थी और राष्ट्रीय ऋण राहत आयोग गठित कर सकती थी.
मीडिया से बात करते हुए सीपीआई नेता डी राजा ने कहा, "कोई नया रास्ता खोजने की जगह बजट केवल नुकसान को रोकने और पहले ही वाले आर्थिक सुधार की दिशा में बढ़ने की बात करता है."
प्रधानमंत्री ख़ुश
कोई नया रास्ता खोजने की जगह बजट केवल नुकसान को रोकने और पहले ही वाले आर्थिक सुधार की दिशा में बढ़ने की बात करता है
सीपीआई के डी राजा
उधर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बजट को 'बेहतरीन' बताया है. उनका कहना था कि बजट 'आम आदमी, मध्य वर्ग और किसानों' के लिए है.
उधर वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने संसद में अपने भाषण के बाद कहा है कि कृषि क्षेत्र बुरी स्थिति में नहीं है और उनका आकलन है कि खाद्य पदार्थों का रिकॉर्द उत्पादन होगा. उन्होंने माना कि कृषि क्षेत्र की विकास दर 2.6 प्रतिशत है जबकि सरकार का लक्ष्य इसे चार प्रतिशत तक पहुँचाना है.
वित्त मंत्री का ये भी कहना था कि किसानों का कर्ज़ माफ़ करना कृषि क्षेत्र की केवल एक समस्या को सुलझाता है लेकिन इस समस्या के और पहलु भी हैं.
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